बुधवार, 28 अगस्त 2019

भदूकड़ा- (भाग-आठ)


(अब तक-
 आज कोई गम्भीर मसला सामने आने वाला था, तभी तो छोटी काकी ने घर के पुरुष वर्ग को नाश्ते के बाद चौके में ही रुके रहने को कहा था. क्या था ये मसला? पढ़िये-)

घर के सारे आदमियों ने नाश्ता कर लिया तो काकी की आवाज़ गूंजी-
अबै उठियो नईं लला. बैठे रओ. कछु जरूरी बात करनै है तुम सें.’
थाली में हाथ धोते बड़े दादा ने काकी की तरफ़ देखा, और थाली खिसका के वहीं बैठे रहे.
’इत्ते साल हो गये, हमने सुमित्रा खों कछु दुख दओ का?’
’आंहां कक्को’
’ऊए खाबे नईं दओ का?’
काय नईं? ऐन दओ तुमने.’
’तौ जा बताओ, सुमित्रा, जिए हम राजरानी मानत, जी की तारीफ़ करत मौं नईं पिरात हम औरन कौ, ऊ ने जा चोरी काय करी? औ केवल जा नईं, जानै कितेक दिनन सें कर रई. बा तौ आज बड़की रानी ने बात खोल दई...’
बड़े दादा अवाक!
सारे देवर आवाक!
चौके में बैठीं देवरानियां अवाक!
और रमा सबसे ज़्यादा अवाक!!
’जे देखो, सुमित्रा रानी ने कटोरी में पकौड़ीं निकार कें धर लईं औ तुमाय कोठा में लुका दईं.’
छोटी काकी ने आंचल में छुपाई, पकौड़ियों से भरी कटोरी निकाल के बड़े दादा के सामने रख दी! उन्हें कुन्ती ने एक-दो बार सुमित्रा द्वारा पूड़ियां छुपा के खाने की बात कुन्ती ने बताई थी पर उन्होंने टाल दी थी. लेकिन आज! ये तो बहुत खराब बात है. सुमित्रा को टेरा गया. लम्बा घूंघट किये सुमित्रा आ के खड़ी हो गयी ओट में. चौके के अन्दर रमा कसमसा रही थी. लेकिन बड़े दादा के सामने जाये कैसे...!
’छोटी बहू, ये क्या सुन रहा हूं मैं? तुमसे तो मुझे ऐसी उम्मीद ही नहीं थी. इस घर में आज तक किसी ने चोरी नहीं की. तुम इतने बड़े घर की , पढ़ी-लिखी लड़की हो के.....!
कटोरी सुमित्रा की तरफ़ सरका दी बड़े दादा ने. सुमित्रा को काटो तो खून नहीं! शर्मिंदगी के मारे उसे लगा कि धरती फट जाये, और वो उसमें समा जाये....!
कुन्ती मूंछों में मुस्कुरा रही थी ( भगवान ने उसे होंठ के ऊपर रोयों की एक गहरी रेख दी भी थी.)
’कुन्ती ने कई बार पूड़ियों बावत हमसे बताया, लेकिन हमने उसे गम्भीरता से नहीं लिया. लेकिन अब तो हद हो गयी.’
क्या!! कुन्ती ने बताया!!! उफ़्फ़..... सुमित्रा जी को चक्कर आ रहा था. लगा, अब और खड़ी न रह पायेंगीं. टप-टप टपकते आंसू, अब धार बन के उनके ही पांव भिगो रहे थे.
उधर चौके में बैठी रमा से अब न रहा गया. सारी मर्यादाओं को ताक पे रखती हुई घूंघट खींच, बड़े दादा और कक्को के बीच खड़ी हो गयी.
’कक्को, बड़के दादा आप औरें जैसौ सोच रय, वैसौ है नइयां. सुमित्रा जिज्जी ने कौनऊ चोरी न करी. जे पकौड़ियां तौ उनने बड़की जिज्जी के लाने धरवाईं हतीं. औ धरबे हम गये हते. औ रई बात पूड़ियन की, तौ बे सोई सुमित्रा जिज्जी अपने लाने, नईं, बड़की जिज्जी के लानै निकरवाउत हतीं. पूड़ी  भी हमई सें निकरवाईं उनने. हमै सब पतौ है. बे बिचारी तौ दुपारी लौ कछु खातींअईं नइयां.’ इतना कह के रमा भी फूट-फूट के रो पड़ी. अब एक बार फिर सबके अवाक होने की बारी थी. कुन्ती का चेहरा पीला पड़ गया. उसे मालूम ही नहीं था, कि सुमित्रा रमा को बता के सामान लाती है उनके लिये!! पहले सुमित्रा और अब बड़के दादा शर्मिन्दगी से गर्दन झुकाए थे. बस एक वाक्य निकला उनके मुंह से-
’हमें माफ़ कर देना छोटी बहू....’
सुमित्रा के लिये तो जैसे तारणहार बन के आई थी रमा! स्नेह तो पहले ही बहुत था दोनों के बीच, अब ये डोर और मजबूत हो गयी. उधर मामला उलट जाने से कुन्ती की रातों की नींद हराम हो गयी. बड़े दादाजी ने कुन्ती से बस इतना कहा था कि-’ अभी जो हुआ सो हुआ, अब आगे न हो, इस बात का ध्यान रखना बड़ी.’ लेकिन कहां ध्यान रख पाई थी कुन्ती? उसका मन तो अब नयी गुड़तान में लगा था कि कैसे बहुत जल्दी ही सुमित्रा को नीचा दिखाये. कैसे इस हार का बदला ले! उधर बड़े दादाजी ने उसी दिन अपने छोटे भाई, यानी तिवारी जी को पत्र लिख दिया कि-
’छोटे, आ के छोटी बहू को ले जाओ, तुरन्त.’
 तिवारी जी परेशान! बड़े दादा ऐसे लिख रहे! क्या किया होगा सुमित्रा ने? बड़े घर की लड़की है, पढ़ी-लिखी है, क्या जाने कुछ बोल-बाल दी हो!! अगर ऐसा हुआ तो कैसे सामना करेंगे बड़े दादा का? छोटा भाई, जिसने बचपन से केवल बड़े दादा को ही देखा था, मां-बाप, भाई हर रूप में, पता नहीं क्या-क्या सोच गये. पत्र मिलने के अगले दिन सबेरे ही चल दिये ग्वालियर से. हिचकते, सकुचाते तिवारी जी घर के पास पहुंचे तो बड़े दादा बाहर चबूतरे पर बैठे नज़र आये. तिवारी जी नज़रें झुकाये पहुंचे, कि जाने अब क्या विस्फोट हो. उधर बड़े दादा तिवारी जी से नज़रें चुरा रहे थे, जिसे तिवारी जी ने कुछ-कुछ महसूस किया. अगर सुमित्रा ने कोई गलती की होती तो बड़े दादा की आंखों से अंगारे बरस रहे होते.
 ’ का हो गओ दादा? इत्तौ अर्जेंट बुलउआ.... सब ठीक तौ है? कौनऊं ग़लती हो गयी होय, तौ माफ़ करियो, छोटो जान के.’ किसी प्रकार हिम्मत जुटा के बोले तिवारी जी.
उधर इतना सुनते ही, इतने सख्त दिखाई देने वाले बड़े दादा, भरभरा के रो पड़े. तिवारी जी इस औचक रुलाई के लिये बिल्कुल तैयार न थे.
सौजन्य: सभी तस्वीरें- गूगल सर्च से साभार

15 टिप्‍पणियां:

  1. ये बड़े दद्दा लोग जब ऐसे रोते हैं ना तो बिल्कुल अच्छा नहीं लगता हमें, कहानी में ही सही।

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    1. हओ लेकिन का करें? कहानी में पात्र अपना काम खुद तय करने लगते हैं। लिखने वाले की मानते कहाँ?

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  2. ऐसे बड़े दद्दा ही होते हैं जो परिवार जोड़े रखते हैं. जहाँ ये न हों, वहाँ सब बिखरा...
    रोचक अंश.

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  3. डायलॉग्स की भाषा कितनी मजेदार है और गांव में सच इतनी ही कुटिल राजनीति खेलती हैं कुटिल औरतें ।

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  4. जुड़तान एक नया शब्द हमारे लिए। गुन्ताड़ा जरूर हमने सुना पढ़ा बोला और किया।
    बड़े दद्दा को महसूस हुआ की उनकी कितनी भद्द पिटी बस इसी बात पर रोने के आलावा कोई चारा नहीं था उनके पास।

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  5. ये बहने इत्ती दुष्ट हो है का ?
    बहरहाल रोचक

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  6. आठवीं से शुरू की अब आगे पीछे दोनों तरफ पढेंगे

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  7. सुमित्रा के लिए मन बड़ा भारी भारी से हो गया कहानी में ऐसे खोये कि स्वयं को उसका हिस्सा मान बैठे।

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