रविवार, 5 फ़रवरी 2017

तुलसी तहाँ न जाइये…..

“कहां जा रही मुनिया?”
“सहेली के यहां”
“अकेली?, भैया को लेती जाओ. न हो तो कल चली जाना. अभी इतना अंधेरा हो गया, लौटते-लौटते तो रात हो जायेगी.”
इतनी शाम गये, मुनिया को तैयार हो, अकेले घर से निकलते देख बाबूजी टोक बैठे.
मुनिया कोई जवाब दिये बिना पलटी, और पांव पटकते हुए अन्दर चली गयी.
“अम्मा, ये बाबू अगर इसी तरह टोकाटाकी करते रहे, तो हमारा तो जीना हराम हो जायेगा. इनसे कह दो, ज़्यादा रोक-टोक न किया करें, नहीं तो फिर हम भी ज़िद्द पे अड़ जायेंगे, हां कहे दे रहे…”  गुस्से के मारे नाक लाल करती मुनिया ने अम्मा को आड़े हाथों लिया.
“हां ठीक है, ठीक है, कह देंगे. लेकिन तुम लौट काहे आईं?”
“तो क्या करती? बाबू बाहर ही तो बैठे हैं. दिन रात वहीं बैठे रहते हैं. कहीं आना-जाना मुश्क़िल कर दिये हैं, सच्ची… अगर ऐसे ही बात-बात पे टोकते रहे तो हमारा तो पहनना-ओढना, आना-जाना सब बन्द हो जायेगा. “ लगभग रुआंसी आवाज़ में बोली मुनिया.
“अरे नहीं. हम समझायेंगे बाबू को. परिवार में रहे नहीं न बाबू, सो उनकी समझ में नहीं आ पा रहा यहां का रंग-ढंग. “
“अम्मा…ssssss….”
अभी मुनिया को दी जा रही समझाइश पूरी भी न हो पाई थी, कि बंटू के चिल्लाने की आवाज़ आई.
“का है बंटू, काहे चिल्ला रहे? का हो गया?”
“ अम्मा, इन बाबूजी को बताओ कि हमारा रुटीन क्या है. ये रोज़ –रोज़ की सफ़ाई देना हमें नहीं पुसाता. अभी कल भी निकलने लगे तो पूछ रहे थे, अब आज लौटे हैं, तो फिर पुछाई. अरे कहीं से चोरी डकैती कर के आ रहे क्या? ऐसे जानकारी लेने लगते हैं जैसे आधी रात को लौट रहे हों हम दबे पांव.” बंटू का पारा हाई था.
“अरे बेटा तुम तो जानते हो बाबू को……” अम्मा ने पुचकारना चाहा.
“न. हम नहीं जानते बाबू को. रहे हैं कभी हमारे साथ, जो हम जानेंगे उन्हें? ज़िन्दगी में पहली बार  एक महीने से देख रहे उन्हें, सो हलकान किये हैं सबको. ऐसा न चल पायेगा, बता देना उन्हें.” बंटू की भुनभुनाहट ज़रा तेज़ थी.
“अरे धीरे बोल बेटा. सुन लेंगे बाबू तो कितना बुरा लगेगा उन्हें?” बैठक के दरवाज़े की ओर देखते हुए अम्मा ने मुंह पर उंगली रख के धीरे बोलने का इशारा किया बंटू को.
“अरे कब तक धीरे बोलें, ये तो अब आ गये हैं परमानेंट…..” बंटू की आवाज़ में झुंझलाहट स्पष्ट थी.
“बंटू, तुम्हारे पिता हैं वे. ये घर उन्हीं के पैसों से बना है, जिसमें हम सब ठाठ से रह रहे हैं. जैसे हम हैं, वैसे ही वे हैं तुम्हारे लिये. इस तरह की बातें शोभा नहीं देतीं. यहां नहीं आयेंगे, तो कहां जायेंगे, रिटायरमेंट के बाद?” अम्मा को अच्छी नहीं लगी थी बंटू की बात. ये अलग बात है कि उनकी हद दर्ज़े की टोकाटाकी से अम्मा भी झुंझला जाती  थीं. ज़रा बाहर निकली नहीं कि कहां जा रहीं? क्यों जा रहीं? फ़लां सब्जी क्यों बनाई? रोटियां बहुत नरम नहीं बनीं. हमारा भोला बहुत अच्छी रोटियां बनाता था. ये बच्चे दिन भर कहां ग़ायब रहते हैं? बहू से कहो बाहर वालों से इतना खुल के न बतियाया करे. मुनिया कभी भी चल देती है, तुमने बहुत छूट दे रखी है. बिगाड़ दिया बच्चों को. अब इस उमर में सुधारने में बड़ी मुश्क़िल आयेगी, आदि..आदि…
बैंक में लिपिक सह रोकड़िया रहे बाबू, यानि कामता प्रसाद पांडे, किसी भी शहर में दो साल से ज़्यादा नहीं रह पाते थे. हर दूसरे साल ट्रान्स्फ़र. शुरु में जब बच्चे छोटे थे, तब अम्मा यानि उनकी पत्नी कुसुम साथ में रहती थीं, लेकिन जैसे ही बड़के की उमर कक्षा एक में दाखिले की हुई, पांडे जी ने अपने पुश्तैनी कस्बे में , अपने पुराने प्लॉट पर घर बनवा लिया. साल भर कुसुम यानि अम्मा किराये के घर में रहीं, और छोटे-छोटे बच्चों के साथ ही मकान बनवा डाला. बहुत मेहनत हुई उनकी. तब घर ठेके पर देने के बाद भी देखरेख करनी पड़ती थी. ऐसा बाबू कह गये थे. देखोगी नहीं तो का जाने कैसा मटेरियल मिला दे ठेकेदार. खून-पसीने की गाढ़ी कमाई थी, ऐसे कैसे व्यर्थ जाने देतीं अम्मा? सुबह दस बजे जो प्लॉट पर पहुंचतीं , तो दोपहर में ही घर आतीं. बड़के को स्कूल से लातीं, मुनिया बहुत छोटी  थी  उस वक़्त. खाना-वाना खा-खिला के फिर प्लॉट पर हाज़िर हो जातीं. मजदूरों के साथ जैसे खुद भी मजदूरी की उन्होंने. एक-एक ईंट अपनी देखरेख में लगवाई, सो बाबू से ज़्यादा अम्मा का जुड़ाव था इस घर से.
घर बनने में साल भर लग गया. बाबू बीच-बीच में आये, लेकिन दो-तीन दिन से ज़्यादा के लिये नहीं. उतने में हिसाब-किताब क्या समझते? सो पूरा ज़िम्मा अम्मा सम्भाले रहीं. बाबू पूरी तरह निश्चिन्त. केवल पैसा बैंक में डलवाते रहे. अम्मा ज़रूरत के मुताबिक निकालती रहीं. जब घर बन के तैयार हुआ, तब भी बाबू गृह प्रवेश के एक दिन पहले ही आ पाये थे. सारी तैयारियां अम्मा ने की थीं. घर बनने के दो साल बाद ही बंटू हुआ था. उस समय भी जेठानी आ गयी थीं कुछ दिन को. बाबू तो वही एक या दो दिन को ही आ पाते. 
मुनिया के स्कूल जाने की उमर होने पर अम्मा ने बाबू से कहा दाखिला करवाने को. बाबू, जो अब तक खुद अम्मा पर निर्भर हो चुके थे, सुनते ही बोले-“ तो हम का करें? तुम जानो. जहां बड़के पढ रहा, वहीं दाखिल करवा दो. “ अम्मा भी उनका जवाब जानती थीं जैसे, सो उन्होंने भी तो मुंह छूने भर के लिये पूछा था. एडमिशन फ़ॉर्म तो वे पहले ही ले आई थीं. अब मुनिया भी स्कूल जाने लगी थी. घर में रह जाते अम्मा और साल भर का बंटू. अम्मा बड़ी-पापड़, अचार, स्वेटर जाने क्या-क्या बनाने में व्यस्त रहतीं. बाबू हर दूसरे और आखिरी शनिवार को आते थे और सोमवार को बड़े सबेरे चले जाते थे. बच्चे केवल एक दिन उनके साथ रहते. बड़के और मुनिया  तो उनके साथ  तीन-चार साल रहे ही थे, लेकिन बंटू का उनके साथ रहना नहीं हो पाया था. बाबू जब आते तो बंटू दरवाज़े के पीछे छिप जाता. उनके सामने तक न निकलता. अजनबी निगाहों से देखता. बाबू गोद में लेने की कोशिश करते तो खूब ज़ोर से रोने लगता. बाबू गोद से उतार देते तो दौड़ के मां के आंचल में दुबक जाता. दो-चार महीने बाद ही बाबू का ट्रांस्फ़र कानपुर हो गया. अब वे घर से ज़्यादा दूरी पर पहुंच गये, सो हर पन्द्रह दिन में घर आने का सिलसिला भी टूट गया. अब वे हर महीने आते, दो दिन के लिये. या फिर कोई छुट्टी पड़ने पर. बच्चे अपने इर्द-गिर्द केवल मां को देख रहे थे. खाना बनाती, कपड़े धोती,  स्कूल ले जाती, रिज़ल्ट लेने जाती, पास होने पर मन्दिर ले जाती, होमवर्क कराती, कहानियां सुनाती, खिलौने दिलाती, साथ में खेलती अम्मा और सिर्फ़ अम्मा. सो अम्मा की हर बात, डांट, रोक-टोक, थप्पड़ सब मंज़ूर था तीनों बच्चों को. लेकिन बाबू…..
                           शाम को बड़के और बहू पिक्चर देखने जा रहे थे. तखत पर बैठे बाबू ने टोका-
 “ कहां जा रहे बड़के?” बड़के ने झिझकते हुए कहा-“ फ़िल्म देखने”
 अरे!! तो अकेले क्यों जा रहे? मुनिया और बंटू को भी ले जाते. साथ में ले जाओ वरना मुनिया फिर अपनी सहेली के साथ अकेले ही चल देखी फिल्म देखने.” बाबू ने आदेश सा देते हुए कहा.
“बाबू हमारे पास दो ही टिकट हैं.” बड़के अभी भी झिझक ही रहे थे.
“दो टिकट माने? और नहीं मिलेंगी अब? पहले ही बहन का टिकट लेना चाहिये था. यानी तुम उसे ले ही नहीं जाना चाहते थे. “ बाबू तनतनाये.
“ येल्लो अम्मा. बाबू का नया नाटक देखो. बेचारी भाभी जनम-करम में तो भैया के साथ निकल पाती हैं, उस पे बाबू हमें भी उनके ऊपर थोपना चाह रहे….” मुनिया की बात पूरी भी न हो पाई थी कि बहू झमकते हुए अन्दर आ गयी. आते ही पर्स एक ओर फेंक , धम्म से कुर्सी पर बैठ गयी. ये वही बहू है, जिसने शिक़ायत के लिये कभी मुंह खोला ही नहीं. हंसती-मुस्कुराती बहू सबके लिये हाज़िर रहती. ये अलग बात है कि अम्मा भी बहू पर जान न्यौछावर किये रहती थीं.उसे कभी अकेले रसोई में नहीं खटने दिया. आखिर ब्याह को हुआ ही कितना समय था, कुल तीन साल ही न! अम्मा ज़िद करके बड़के और बहू को घूमने-फिरने, शॉपिंग के लिये या फ़िल्म देखने भेजतीं. आज भी दोनों महीने भर बाद निकलने वाले थे, लेकिन बाबू ने सब गड़बड़ कर दिया. बड़के का भी मन उचट गया था फ़िल्म देखने जाने से. बाबू के आने के बाद से बहू वैसे भी अब खुल के बाहर नहीं निकल पाती थी, क्योंकि बाबू जी बैठक में तखत पर बैठे रहते या फिर बाहर बरामदे की आराम कुर्सी पर. दोनों स्थितियों में बाबू से सामना होना ही था. सालों बाद बाबू नाम के इस शख़्स को अपने बीच पा के वैसे भी बच्चे उनसे बहुत आत्मीयता जोड़ नहीं पा रहे थे. ऊपर से उनकी टोका-टोकी…
बाबू  भी क्या करें? जब यहां आये, अपने सामान सहित तो देखा कि घर पहले से ही सबके हिस्सों में बंट चुका है. घर में तीन बेडरूम, एक ड्रॉइंग रूम , रसोई, भंडारघर और पूजाघर है. बड़के की शादी के बाद एक कमरा उन दोनों का हो गया. एक कमरा बंटू और मुनिया के पढ़ने-सोने का. ये अलग बात है कि दोनों ही अलग-अलग समय पर पढ़ते सोते थे सो हमेशा लड़ते रहते थे. मुनिया कई बार कह चुकी थी कि उसे अलग कमरा चाहिये. एम.एससी. का अन्तिम साल है, रिज़ल्ट खराब नहीं कर सकती इस बंटू के चक्कर में. खैर….. बाबू के साथ काफ़ी सामान आया था, जबकि उनका कहना था कि आधे से ज़्यादा सामान तो वे भोला को दे आये हैं. फिर भी एक नया कूलर, खूब बड़ी बड़ी दो अलमारियां, बर्तनों का एक लोहे वाला बक्सा, दो बक्से भर के किताबें, तीन सूटकेस उनके कपड़ों के. जो कमरा अम्मा-बाबू का कहलाता था, वो पहले ही घर भर के अतिरिक्त सामानों से भरा पड़ा था, केवल एक तखत की जगह थी उस कमरे में अब तो कहना ही क्या! बाबू की अल्मारियां और सूटकेस किसी प्रकार अटाये गये वहां. अम्मा ने तखत निकाल के बैठक में डलवा दिया, और खुद अपने लिये फ़ोल्डिंग पलंग डाल लिया, क्योंकि उसी के लायक़ जगह बची थी वहां. बाबू का इंतज़ाम बैठक में किया गया. उनके लिये यहीं जगह बची थी. बाबू से ये कहते हुए अम्मा थोड़ा हिचकिचाईं भी, लेकिन क्या करतीं? कहना तो था ही.
                                   बाबू यानि कामता प्रसाद पांडे , नौकरी करते-करते थक गये थे. या घर से दूर रहते हुए अकेले पन ने उन्हें थका दिया था. पचपन का होने के बाद से ही अट्ठावन का होने के इंतज़ार में थे. ( तब अट्ठावन साल में रिटायर हो जाते थे न) चाहते थे कि जल्दी रिटायर हों, और घर पहुंचें. छुट्टी में जब भी घर जाते हैं, बच्चे कैसे आस-पास मंडराते रहते हैं. लेकिन केवल एक दिन बाद ही जब उन्हें वापस जाता देखते हैं, तो कितने रुआंसे हो जाते हैं. पांडे जी को ही कौन सा अच्छा लगता है बच्चों को छोड़ के जाना. लेकिन क्या करें? नौकरी न करें तो घर कैसे चले? पत्नी कुसुम भी कैसी खिल जाती है उन्हें देख के. बाबू की पसन्द की सब्ज़ी, उनकी पसन्द का रायता, कढ़ी, आलू के पराँठे, क्या-क्या नहीं बना डालती दो दिन के अन्दर. जाते समय कुछ न कुछ सूखा नाश्ता रख देती है कि ऑफ़िस से लौट के खा सकें. बच्चे छोटी-छोटी चीज़ें पा के कूदने लगते. बड़के और मुनिया उनके साथ कुछ साल रहे हैं, सो उनके ज़्यादा क़रीब हैं. बाबू-बाबू करते आगे पीछे घूमते हैं,. बंटू ज़रूर उनके साथ नहीं रह पाया सो थोड़ा दूर-दूर रहता है. लेकिन कोई बात नहीं. है तो उनका बेटा ही.
वे जब भी ज़रा लम्बी छुट्टी में आते तो जाते हुए पत्नी कहती-“ अब बहुत हुआ. ट्रांस्फ़र  हो पाता तो अच्छा था. हम भी अकेले गृहस्थी सम्भालते-सम्भालते उकता गये हैं.”  बच्चे उनके कंधे पर झूलते हुए पूछते-“ बाबू, तुम यहां क्यों नहीं रहते? नौकरी छोड़ दो न. हमें साइकिल पर घुमाने कोई नहीं ले जाता, तुम आ जाओ तो रोज़ घुमाओगे न?” बाबू की आंखें भर आतीं. झूठी तसल्ली देते- “ बहुत जल्दी आ जाउंगा बेटा. देखना, छोड़ दूंगा नौकरी.” लेकिन फिर ये वादा झूठा ही साबित होता. बड़के और मुनिया ने बड़े होते ही ऐसी ज़िद करना तो छोड़ दिया था, लेकिन उनके आने पर बेहद खुश और जाते समय उतने ही उदास हो जाते थे दोनों. फिर बड़के की शादी तक का मौका आ गया, बाबू रिटायर न हो पाये. बहू आ गयी और पत्नी, यानि कुसुम बहू के साथ व्यस्त-मस्त हो गयीं. मुनिया की भी शादी की उमर हो गयी थी. कुछ लड़के उन्होंने देख रखे थे, सोचते थे जा के आराम से चर्चा करूंगा कुसुम से. लेकिन यहां आने पर उन्हें महसूस हुआ कि घर के सारे हिस्से, यहां स्थाई रूप से रहने वालों के नाम हो चुके हैं. जो उनका कमरा था, उन्हीं  के अतिरिक्त सामान के चलते , भंडारघर में तब्दील हो चुका था. बैठक में उनकी व्यवस्था कर दी गयी थी, जैसे किसी भी आने-जाने वाले की ,की जाती है. जबकि बाबू चाहते थे, कि अपने खूब हवादार कमरे में बढिया डबल बेड डलवायेंगे और सफ़ेद नरम बिस्तर पर पत्नी कुसुम से खूब बतियायेंगे. पता नहीं कितनी बातें हैं बताने के लिये. मुनिया के रिश्ते सम्बंधी बातें भी तो रात में ही की जा सकती हैं. दिन भर तो वे पत्नी को चकरघिन्नी हुए ही देखते हैं. लेकिन अब उनका कमरा हवादार कहां? उन्हीं की अल्मारियों ने खिड़कियां ढंक दी हैं. एक तरफ़ कूलर रखा है, पैक किया, तो दूसरी तरफ़ उनके बक्से, सूटकेस. जो अल्मारियां पहले से थीं, वे तो थीं ही.
एक बात और महसूस कर रहे हैं बाबू कामता प्रसाद. बच्चों में कुछ अजब सा बदलाव हुआ है. पहले जब वे आते थे, तब जितना उत्साह और इंतज़ार इनके मन में होता था, उतना अब महसूस नहीं हुआ. उनकी किसी भी बात पर बच्चे जिस तरह पांव पटकते अन्दर जाते थे, वो उन्होंने देखा नहीं था क्या? जबकि सच तो ये है कि बाबू किसी पर कोई पाबन्दी नहीं लगाना चाहते, लेकिन आने-जाने का कुछ तो क़ायदा हो न? ज़माना इतना खराब है और शादी के लायक़ लड़की अकेली चल दी, डूबती सांझ में. कानपुर में तो उन्होंने ऐसे-ऐसे कांड देखे हैं कि अकेली लड़की को कहीं भी जाता देखते हैं, तो सोचते हैं कि इसे मैं ही पहुंचा आऊं क्या, जहां जा रही वहां. लेकिन  कर कुछ नहीं पाते. यहां का माहौल वैसा नहीं है, लेकिन अब माहौल की भली चलाई. कब कहां क्या हो जाये, कोई जानता है क्या? लेकिन कल मुनिया का पैर पटकते जाना, और फिर बंटू की बातें…… बाबू अपनी सफ़ाई देने कमरे के दरवाज़े तक पहुंचे ही थे, कि उन्हें बंटू की आवाज़ सुनाई दे गयी थी. क्या कह रहा था , वो भी.  कट के रह गये थे बाबू. परिवार के मनों में उनके लिये क्या जगह है, इस बात का अन्दाज़ा भी हो गया था बाबू को. उन्हें कानपुर का अपना एक कमरे का फ़्लैट याद आ रहा था, जहां भोला खाना बना के रख जाता था. उनकी हर बात सिर झुका के सुनने को तत्पर रहता था भोला. प्यार भी बहुत करता था. यहां प्यार तो दूर, इज़्ज़त का सुराग भी नहीं मिल रहा. 
रात को तखत पे लेटे तो उन्हें कानपुर की उस कोचिंग की याद आई, जो बैंकिंग सेवाओं के लिये कोचिंग देती थी. कितनी मनुहार की थी उसके संचालक ने. पच्चीस हज़ार दे भी रहे थे. कम नहीं हैं अकेले आदमी के लिये पच्चीस हज़ार. अभी बुढापा नहीं आया है जो बैठ जायें अशक्त हो के. पेंशन घर खर्चे के लिये काफ़ी है. फ़िर बड़के भी है अब तो ज़िम्मेदारी उठाने के लिये. बाबू ने तय कर लिया था, वे कल ही कोचिंग के संचालक को फोन करके अपनी सहमति दे देंगे.
सुबह बाबू बहुत फ़्रेश मूड में उठे थे. नाश्ता करके अपनी अटैची जमा रहे थे. अम्मा ने अचरज से देखा –“ अब कहां जाने की तैयारी है ? अटैची काहे लगा रहे?”
बाबू ने मुस्कुराते हुए अम्मा को देखा-“ अरे जानती हो, वो कोचिंग वाले हैं न पीछे पड़े हैं. कोई बहुत मेहनत का काम भी नहीं. कुल चार घंटे की नौकरी है. पैसा भी अच्छा ही दे रहे. इधर एक महीने से बेकार पड़े-पड़े ज़ंग ही लग गयी हाथ-पैरों में. सोचता हूं कि चला जाऊं. छुट्टी-छुट्टी आता रहूंगा. तुम चाहो तो चलो साथ में. यहां बच्चे सब समझदार हो गये हैं अब.”
बाबू के दोबारा जाने की खबर से अम्मा उदास तो हुईं, लेकिन दुखी नहीं. बच्चों के व्यवहार से वे भी दुखी थीं. बाबू के लिये कोई ग़लत बोले, ये भी उन्हें पसन्द नहीं और बच्चों की आज़ादी में बाबू खलल पैदा करें, ये भी उन्हें पसन्द नहीं. तो ऐसे में बाबू का दोबारा नौकरी करना उन्हें अखर नहीं रहा था. लेकिन खुद साथ चलने की बात पर बोलीं- “ साथ कैसे चलेंगे हम? अभी मुनिया है, बंटू है. बहू भी तो है. सब छोटे ही समझो. हां मुनिया के लिये अच्छा रिश्ता ज़रूर देखते रहना.”
जाते हुए बाबू ने पूरे घर पर नज़र डाली, और अम्मा से बोले-“ देखो कुसुम, सबका खयाल रखना और परेशान न होना. जब जी चाहे, आ जाना. मैं आता ही रहूंगा. एक बात और, अगली बार मेरा इंतज़ाम मेरे कमरे में ही करना, ताकि कुछ दिन टिक सकूं. बैठक में तो मेहमाननवाज़ी की जाती है, सो कर ली… ।

बाबू के जाने से बच्चे उदास थे, या निश्चिंत, अम्मा समझ नहीं पाईं, हां उन्होंने ज़रूर बैठक में आ के लम्बी सांस ली. पता नहीं , राहत की या उदासी की….।
चित्र: गूगल से साभार

18 टिप्‍पणियां:

  1. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, "निजहित, परहित और हम “ , मे आप की पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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  2. वाह्ह्ह्ह्ह्ह्ह, अपनी सी लगी कहानी,हाँ रिश्तों में गहराई के लिये साथ कितना ज़रूरी ये भी बखूबी बयां किया,
    पर एक प्रश्न कि,बाबू कामता प्रसाद का अस्तित्व मात्र इतना ही था याने वो टोकाटाकी न करते तो,क्या उचित सम्मान पा जाते....बहुत बहुत बधाईयाँ आपको.

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    1. बहुत शुक्रिया चारु जी यहाँ आने के लिए।

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  3. Joint family, and staying alone, missing seeing children growing up and missing those family atmosphere. All that pain is shown beautifully in this story. Asking to make his sleeping arrangements in his room only shows how he was feeling like a traveller in his own house. great story.

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  4. घर से दूर रहकर नौकरी करने वालों का सच है यह। घर के बदले हुए स्वरुप में वे फिट नहीं बैठ पाते। नौकरी करते रिटायरमेंट का इंतजार करते हैं कि बाल बच्चे सहित रह पाएंगे पर घर पर उनकी किसी को जरूरत ही नहीं।
    बहुत ही समायिक और बढ़िया कहानी ।

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  5. जिज्जी! हमारे पिताजी ने सारी उम्र इलाहाबाद में गुज़ार दी! मेहमान की तरह आते थे और चले जाते थे! बहुत सारी बातें करते थे हमसे. ये सिनेमा और साहित्य की बुरी लत उन्होंने ही लगाई थी. अम्मा बहुत सख्त थीं! पिताजी कहते थे कि तुम्हारी माँ मेरा रोल निभा रही हैं, इसलिए मुझे दोस्त रहने दो! अम्मा ने हम सभी को बस एक बात समझाई कि ज़िन्दगी में कोई ऐसा काम मत करना जिससे लोग ये कहें कि पिता के न होने के कारण माँ ने ठीक से बच्चों की परवरिश नहीं की.
    यह कहानी कोई सीख नहीं देती है, कोई ज्ञान नहीं बघारती है! एक परिवार का आईना दिखाती है, जो मेरी या उसकी किसी की कहानी हो सकती है! यह कहानी सोचने पर मजबूर करती है और अनगिनत विचारों को जन्म देती है! जिसे जो अर्थ निकालना हो, जो सीख ग्रहण करनी हो, जो निष्कर्ष निकालना हो, जो तर्क देना हो, जिसे भी उचित ठहराना हो... स्वतंत्र है! इस कहानी से उपजे सवाल के कई जवाब हैं और खूबसूरत बात यह है कि सारी जवाब सही हैं!!

    बहुत सुन्दर कहानी!!

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  6. थोड़ी बढ़ी हुई धड़कन के साथ आई थी तुम्हारी टिप्पणी पढ़ने, क्योंकि कहानी के विषय में लिखते समय तुम जिज्जी के अनुज नहीं होते बल्कि एक सतर्क पाठक, विशुद्ध समालोचक होते हो। तुम्हारी टिप्पणी का इंतज़ार रहता है मुझे। धन्यवाद की औपचारिकता से परे है तुम्हारी टिप्पणी।

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  7. कितना अच्छा विषय लिया है वेंडी। और कितनी सच्चाई और व्यवहारिकता से दर्शाया है उसे। पर समझदार निकले बाबू, वरना बड़ी समस्या हो जाती।

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