शनिवार, 26 नवंबर 2016

डेरा उखड़ने से पहले….!

'डेरा उखड़ने से पहले' अब आप अपनी प्रिय पत्रिका सेतु की वेबसाइट पर पढ़ सकते हैं, विश्वास है कि आप नीचे दिए लिंक पर चटका लगाने का कष्ट जरूर उठाएंगे। हाँ टिप्पणी वापस यहीं प्रदत्त की जा सकती है। 
http://www.setumag.com/2017/02/Vandana-Awasthi-Dubey-Hindi-Fiction.html

27 टिप्‍पणियां:

  1. वाह शानदार प्रवाह संग सटीक चित्रण,लगा मानो कोई फिल्म देख रहे हैं...हर एक वो बात जो तबके दौर से आज़ भी सामने आ ही जाती है, सब पर पैनी नज़र के साथ सटीक चित्रण...दिल से बधाई आपको....

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    1. कहानी पढ़ने और कमेंट करने का शुक्रिया चारु जी।

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    2. Madam ye story maine radio pr suni thi pr adha hi sun payi or story ke sath diya hua link khul ni rha ormujhe ye story puri pdni h pls hepl me

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  2. रिश्तों की सच्चाई बयान करती कहानी। शुभरात्रि से ही शुभप्रारम्भ होगा ।

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  3. बहुत अच्छी लगी कहानी,उम्र के किसी मोड़ पर तो कोई मिला...कहानियों से शुरुआत होगी तो हकीकत बनते देर नहीं लगेगी। बदलाव किब्यार जरूर बहेगी।

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  4. हमेशा की तरह प्रवाहपूर्ण कथानक और भावपूर्ण चरित्रचित्रण। आभाजी ना केवल वर्तमान के बिखरे हुये सामाजिक रिश्तों का वर्णन है बल्कि उन हजारों स्त्री पुरूषों का प्रस्तुतीकरण है जो उम्र के अहम् पड़ाव में जीवनसहायक के रूप में आपनी ख़ुशी की तलाश करते है।
    आपकी लेखनी के खजाने से कुछ मोती और चाहिये जो परिवार और रिश्तों के बीच सामंजस्य बिठाने की जद्दोजहद को प्रदर्शित करता हो।
    धन्यवाद
    सुरेन्द्र शेखावत
    झुन्झुनु राजस्थान
    9810925394

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    1. बहुत बहुत शुक्रिया सुरेंद्र जी। जल्दी ही अन्य कहानियां पोस्ट करुँगी।

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  5. बहुत अच्छा विषय उठाया है आपने...| अक्सर उम्र के एक मोड़ पर पहुँचने के बाद...ख़ास तौर से औरतों के मामले में...कोई नहीं सोचता कि उन्हें भी किसी सच्चे साथी की ज़रुरत हो सकती है...| सबसे ज़्यादा दुखद तो यह है कि किसी भी रूप में, किसी भी उम्र में एक अकेली औरत पर यह समाज बदचलनी का टैग तो बहुत आसानी से लगा देता है...| इन्हीं सब डर से एक औरत चाहे भी तो अपने दिल की नहीं सुनती...|
    एक अच्छे पक्ष को ख़ूबसूरती से बयान करती इस कहानी के लिए बहुत बधाई...|

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    1. प्रियंका कहानी को आत्मसात करने और इतनी सारगर्भित टिप्पणी के लिए दिल से शुक्रिया।

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  6. बहुत पॉजिटिव लगी यह कहानी ,हालाँकि मुझे लगता है कि अभी बहुत से अकेले लोग अपने बारे में सोच कर भी ऐसा करने की हिम्मत जुटा नही पाते ,पर अच्छा लगा पढ़ कर इस कहानी को

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    1. हां रंजू। सच्चाई यही है कि लोग चाहने के बाद भी समाज के डर से अपनी इच्छा को नकारते हैं। ये कोशिश हम कहानियों में तो फलीभूत कर ही सकते हैं। खूब धन्यवाद।

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  8. "शुभरात्रि"
    जीवन के नूतन सूर्योदय के लिए ��
    जाने-अनजाने एक feminist सोच लिए कहानी, जो बड़ी सौम्यता लिए अपना पक्ष रखती है . . . अच्छी लगी।

    सुनीता दमयंती पाण्डेय

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  9. बहुत दिनो बाद तुम्हारी लिखी कहानी पढ़ी ।हमेशा की तरह सुन्दर ।

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    1. हां ज्योति बहुत दिनों के बाद पोस्ट ही की। धन्यवाद तुम्हारा।

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  10. बहुत दिनो बाद तुम्हारी लिखी कहानी पढ़ी ।हमेशा की तरह सुन्दर ।

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  11. एक मध्यमवर्गीय परिवार का बेहद सजीव शब्दचित्र दिखाई दिया शुरू में. बहुत कुछ घूम गया नज़रों के सामने से. लगा अपने पड़ोस की कोई कहानी देख रहा हूँ. मेरी जानकारी में एक परिवार में तीन बेटियाँ और एक बड़ा बेटा था. दो लडकियों ने प्रेम विवाह कर लिया था, लेकिन तीसरी नहीं कर पाई. और उसे पिता और भाई-भाभी का यह उलाहना सुनने को मिलता था कि ये क्यों किसी के साथ भाग नहीं जाती. बाद में अधिक उम्र में उसकी शादी हुई जिसपर मैंने एक कहानी भी लिखी थी अपने ब्लॉग पर.
    अब आता हूँ आपकी कहानी पर. बंगाल में अच्छा खासा समय बिताने के कारण, यह कहानी मुझे आज भी कोलकाता शहर की कई अविवाहित नौकरीपेशा महिलाओं/ लडकियों की याद दिलाती है. स्वयं बंगाल की मु. मंत्री सुश्री ममता बंदोपाध्याय इसका उदाहरण हैं. कहने को कोई यह भी कह सकता है कि उन्होंने अपने राजनैतिक लक्ष्य के लिये यह निर्णय लिया हो. लेकिन ऐसी कई ममता वहाँ दिखती हैं. कई अपने ऊपर बदचलनी का टैग लिये और कुछ बाध्यता में उस राह पर चलने को मजबूर, क्योंकि एक बड़े परिवार की जिम्मेदारी अपने कंधे पर स्वत: ही ढोने को बाध्य, जबकि उसके भाई विवाहोपरांत दूसरे घर में शिफ्ट हो चुके होते हैं, जिम्मेदारी से भागने के लिये.
    मेरे रिश्ते में एक परिवार में एक भाई और पाँच बहनें हैं... सभी सुंदरता की किसी भी परिभाषा पर नहीं खरी उतरती. लेकिन उनमें जो सबसे सुन्दर थीं और उन्हें सुंदरता पर नाज़ भी था, आज तक कुंवारी हैं. जबकि उन बहनों में जो सबसे बदसूरत थीं, उनकी लव मैरिज हुई. ये सब देखकर लगता है कि जोडियाँ आसमाँ में बनती हैं.
    आभा जी के बारे में दो बातें कहना चाहूँगा कि उन्होंने अपना सारा जीवन परिवार को समर्पित कर दिया और भाई बहनों द्वारा मूर्ख भी बनाई जाती रहीं. उन्हें कम से कम जानते बूझते मूर्ख नहीं बनना चाहिए और सख्त होकर एक बार 'ना' कह देना चाहिए. दूसरी बात उनके अंदर छिपी एक औरत के विषय में... स्त्रियाँ चाहे कितना भी प्रगतिशील न हो जाएँ, कितना भी नारीवादी झंडा बुलंद करें, लेकिन अपने भीतर यह महसूस करती हैं कि एक पूर्णता से वंचित रह गई हों. जब भी कोई अपना प्यार से कंधे पर हाथ रख दे तो पिघल कर उसकी बाहों में समा जाए. कोई माँ पुकारे तो दुनिया की सबसे कोमल दिल वाली बन जाए और उम्र की संध्या में साथ में कोई साथ चाय पीने वाला न हो तो अकेलापन महसूस करे.
    जिज्जी, बहुत कुछ कहना है, लेकिन यह विषय ऐसा है कि कहने से मैला न हो जाए इस बात का डर लगता है, लेकिन दिल से महसूस करूँ तो आभा जी के दिल की धड़कनों को सुन सकता हूँ. उन्हें अपने दिल की धडकनें सुनाई दीं, यह बहुत अच्छा है!
    बहुत अच्छी लगी ये कहानी! बहुत कुछ कहने से अधिक महसूस करने जैसा, आसा पड़ोस की घटना की तरह!

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    1. सलिल, अपनी किसी भी रचना पर लिखने वाले का मन "बहुत बढिया" या "क्या बात" सुन के मन नहीं भरता. मन भरता है विस्तृत चर्चा से. किसी भी रचना के साथ न्याय भी तभी हो पाता है जब उसके हर बिन्दु पर चर्चा हो. तुम्हारी ऐसी विस्तृत टिप्पणी पढ के मेरे साथ, आभा जी भी प्रसन्न हो गयी होंगीं.

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  13. पारिवारिक हालातों ज़िक्र एकदम सटीक है और इस निःस्वार्थ लगाव का भाव मर्मस्पर्शी | सचमुच साथ देने की सोच और कुछ नहीं | अब ऐसी कहानियों को हक़ीकत बनने की दरकार है |

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    1. आपकी टिप्पणी का इंतज़ार ही कर रहे थे हम।

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  14. रेखा दीदी आपने बहुत मर्मस्पर्शी कहानी लिखी है. मेरे पास तारीफ करने के लिए शब्द नहीं हैं

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