शुक्रवार, 22 अप्रैल 2011

प्रिया की डायरी

"प्रिया...रूमाल कहां रख दिये? एक भी नहीं मिल रहा."
" अरे! मेरा चश्मा कहाँ है? कहा रख दिया उठा के?"
" टेबल पर मेरी एक फ़ाइल रखी थी, कहाँ रख दी सहेज के?"
दौड़ के रूमाल दिया प्रिया ने.
गिरते-पड़ते चश्मा पकड़ाया प्रिया ने.
सामने रखी फ़ाइल उठा के दी प्रिया ने.
" ये क्या बना के रख दिया? पता नहीं क्या करती रहती हो तुम? कायदे का नाश्ता तक बना के नहीं दे सकतीं...."
रुआंसी हो आई प्रिया.

अनंत के ऑफ़िस जाते ही धम्म से सोफ़े पर बैठ गई . सुबह पांच बजे से शुरु होने वाली प्रिया की भाग-दौड़, अनन्त के ऑफ़िस जाने के बाद ही थमती थी. सुबह अलार्म बजते ही प्रिया बिस्तर छोड़ देती है. आंखें बाद में खोलती है, चाय पहले चढा देती है. उसके बाद दोनों बच्चों का टिफ़िन बनाने, यूनिफ़ॉर्म पहनाने,बस स्टॉप तक
छोड़ने, फिर अनन्त की तमाम ज़रूरतें पूरी करने उन्हें ऑफ़िस भेजने में नौ कब बज जाते, पता ही नहीं चलता. सुबह से प्रिय को चाय तक पीने का समय नहीं मिलता. नौ बजे प्रिया आराम से बैठ के चाय पीती है.

फिर शुरु होता सफ़ाई का काम. बच्चों का कमरा, अपना कमरा, ड्रॉंइंग रूम सब व्यवस्थित करती. साथ ही कपड़ा धुलाई भी चलती रहती. नहाते और खाना बनाते उसे एक बज जाता. फ़ुर्सत की सांस ले, उससे पहले ही बच्चों के आने का टाइम हो जाता, और स्टॉप की तरफ़ भागती प्रिया. दोनों बच्चों के कपड़े बदलते, खाना खिलाते-खिलाते ही अनन्त के आने का समय हो जाता. अनन्त का लंच दो बजे होता है.उन्हें खाना दे, खुद खाने बैठती. अनन्त के जाने के बाद पूरा किचन समेटती, बर्तन ख़ाली करती,घड़ी तब तक साढ़े तीन बजाने लगती.

थोड़ी देर आराम करने की सोचती है प्रिया. अभी बिस्तर पर लेटी ही थी कि फोन घनघनाने लगा. रोज़ ही ऐसा होता है. कई बार तो बस टेलीफोन कम्पनियों के ही फोन होते हैं, लेकिन उठ के जाना तो पड़ता ही है न! कई बार सोचती है प्रिया, कि लैंड लाइन फोन कटवा दे, लेकिन बस सोचती ही है.

पाँच कब बज जाते हैं, उसे पता ही नहीं चलता. पाँच बजते ही फिर काम शुरु. बच्चों को दूध दिया, अपने लिये चाय बनाई. बच्चों को सामने वाले पार्क में खेलने भेज के खुद रात के खाने की तैयारी शुरु कर देती
है. अभी तैयारी कर के न रक्खे, तो बच्चों को पढाये कब? साढ़े छह बजे बच्चों को पढाने बैठती. उनका होमवर्क या टैस्ट जो भी होता, उसके तैयारी करवाती.साढ़े सात बजे अनन्त आ जाते. आते ही नहाते और पेपर ले के टी.वी. के सामने बैठ जाते. बच्चों का शोर पसंद नहीं उन्हें. बच्चे शोर करते तो झल्लाते प्रिया के ऊपर, जैसे इसके पीछे प्रिया का हाथ हो!

कभी बच्चों का झगड़ा निपटवाती , तो कभी रसोई में सब्जी चलाती , हलकान हो जाती है प्रिया.
रात का खाना होते , बच्चों को सुलाते , किचेन समेटते साढ़े दस बज जाते. मतलब सुबह पाँच बजे से लेकर रात साढ़े दस बजे तक जुटी रहती है प्रिया. अनन्त की ड्यूटी सुबह नौ बजे शुरु होती है,
और सात बजे खत्म, यानी दस घंटे. और प्रिया की? सुबह पांच बजे से रात साढ़े दस बजे तक! साढ़े सत्रह घंटे! उसके बाद भी सुनना यही पड़ता है, कि करती क्या हो??? दिन भर तो घर में रहती हो!!!

मतलब घर का काम, काम नहीं है? बाहर नौकरी करने पर ही कुछकरना कहलायेगा?

बहुत बुरा लगता है प्रिया को, जब अनन्त दूसरी कामकाजी महिलाओं से उसकी तुलना करते हैं, और कमतर आंकते हैं.

चाहे तो प्रिया भी नौकरी करने लगे. अच्छी भली एम.ए. बी.एड.है. किसे भी प्रायवेट स्कूल में नौकरी मिल ही जायेगी. पिछले साल तो डब्बू की प्रिंसिपल ने उससे कहा भी था, हिन्दी टीचर की जगह ख़ाली होने पर. उसने ही मना कर दिया था. अपनी सारी इच्छाएं, सारे शौक घर के काम के नाम कर दिये, और हाथ में
क्या आया? निठल्ले की उपाधि?

"करती क्या हो-करती क्या हो.." सुनते- सुनते प्रिया भी उकता गई है. सो इस बार जब डब्बू का रिज़ल्ट लेने गई तो अपना रिज़्यूम भी थमा आई प्रिंसिपल को. उन्होंने कहा- " मैने तो पहले ही आपसे कहा था. आपके जैसी ट्रेंड टीचर को अपने स्टाफ़ में शामिल कर के बहुत खुशी होगी हमें". एक अप्रैल से ही डैमो के लिये आने को कहा,. एक अप्रैल!! यानी तीन दिन बाद ही!

घर में नयी व्यवस्थाएं शुरु कर दीं उसने. सबसे पहले अनन्त को बताया- कि " लो. अब कुछ न करने की शिक़ायत दूर होगी तुम्हारी" अनन्त अवाक!!
"अरे! कैसे होगा?"
"होगा. जैसे और कामकाजी महिलाओं के घर होता है." प्रिया ने भी लापरवाही से जवाब दिया.
"तुम्हें भी काम में हाथ बंटाना होगा".
क्या कहते अनन्त? खुद ही तो सहकर्मी महिलाओं का उदाहरण देते थे.
घर के नये नियमों का बाक़ायदा लिखित प्रारूप तैयार किया प्रिया ने. अनन्त को पकड़ाया-
नियमावली-
  1. सुबह पांच बजे उठना होगा.
  2. अपने कपड़े खुद तैयार करने होंगे.
  3. अपना सामान खुद व्यवस्थित रखना होगा.
  4. बच्चों को छोड़ने स्टॉप तक जाना होगा.
  5. टिफ़िन साथ में ले जाना होगा.
  6. शाम को बच्चों का होमवर्क कराना होगा, क्योंकि उस वक्त प्रिया को सुबह के खाने की तैयारी करनी होगी.

    " ये कौन से मुश्किल काम हैं? तुम्हें क्या लगता है, मैं नहीं कर पाउंगा?"
" न. कोई मुश्किल काम नहीं हैं. तुम कर पाओगे, मुझे पूरा भरोसा है" कहते हुए हंसी आ गई थी प्रिया को. जानती थी, कितना मुश्किल है अनन्त के लिये सुबह पांच बजे उठना. ये भी जानती थी, कि यदि वो शुरु से ही नौकरी कर रही होती, तो पूरा रुटीन उसी तरह बना होता सबका. अब जबकि सबकी निर्भरता प्रिया पर है, तब दिक्कत तो होगी न? लेकिन कोई ये कहां मानता है कि उसके नहीं होने से दिक्कत भी हो सकती है? यही तो साबित करना चाहती है प्रिया.

आज से प्रिया को स्कूल ज्वाइन करना था. तीन बार उठा चुकी अनन्त को, लेकिन कोई फ़ायदा नहीं. अनन्त के चक्कर में स्कूल बस भी निकल गई. अनन्त अभी भी सो रहे थे. सैकेंड ट्रिप की बस में प्रिया को जाना था. जल्दी-जल्दी उसने नोट लिखा-

" तुम्हारे समय पर न उठने के कारण बच्चे स्कूल नहीं जा सके. अब अब तुम्हें लंच तक की छुट्टी लेनी होगी"

नोट टेबल पर दबा के रखा, और भागी प्रिया. उठने के बाद अनन्त पर क्या बीती, ये तो वही जानता है.
अगले तीन दिनों में सबकी दिनचर्या अस्त-व्यस्त हो गयी.अनन्त बच्चों को ठीक से पढा ही नहीं पा रहे थे. बच्चों ने एलान कर दिया कि वे पापा से नहीं पढ़ेंगे।

रात में अनन्त ने अनुनय भरे स्वर में कहा-
" प्रिया, ये घर तुम्हारे बिना नहीं चलने का. तुम्हारा घर में रहना कितना अहम है, ये मैं पहले भी जानता था, और अब तो बड़ी शिद्दत से महसूस कर रहा हूं. अभी तो तुम्हारा डैमो चल रहा है, तुम अगर सचमुच नौकरी करना चाहती हो, तो करो, लेकिन हम सबको तुम्हारी ज़रूरत है."
अंधेरे में भी अनन्त ने महसूस किया कि प्रिया मुस्कुरा रही है, विजयी मुस्कान, लेकिन अनन्त को प्रिया की यह जीत मंजूर थी। :)
चित्र: गूगल सर्च से साभार

रविवार, 17 अप्रैल 2011

मेरी पसंद.....

टुकड़े-टुकड़े दिन बीता, धज्जी-धज्जी रात मिली
जिसका जितना आँचल था, उतनी ही सौगात मिली

रिमझिम-रिमझिम बूँदों में, ज़हर भी है और अमृत भी
आँखें हँस दीं दिल रोया, यह अच्छी बरसात मिली

जब चाहा दिल को समझें, हँसने की आवाज़ सुनी
जैसे कोई कहता हो, ले फिर तुझको मात मिली

मातें कैसी घातें क्या, चलते रहना आठ पहर
दिल-सा साथी जब पाया, बेचैनी भी साथ मिली

होंठों तक आते आते, जाने कितने रूप भरे
जलती-बुझती आँखों में, सादा-सी जो बात मिली

० मीना कुमारी

लीजिये, मीना कुमारी जी की ही आवाज़ में सुन लें ये ग़ज़ल( अनामिका जी की विशेष इच्छा पर)

मंगलवार, 5 अप्रैल 2011

दस्तक के बाद: एक और पढ़ी हुई कहानी सुन ही लें..

सारा कमरा बनारसी साड़ियों, सूट के कपड़ों, बच्चों के कपड़ों, शाल, स्वेटर और जेवरों से अटा पड़ा था.
बहुत प्यारी-प्यारी साड़ियाँ थी नीले रंग की कांजीवरम साड़ी तो बहुत ही प्यारी थी. मनीष, निशि , रीना और सीमा इन चारों के ऊपर कपड़े खरीदने की ज़िम्मेदारी थी, जिसे इन लोगों ने बखूबी निभाया था.
' मम्मी- चलो सबको कपड़े दिखा दूं , और बाँट दूं '
यह जानने के लिए तो सभी उत्सुक थे, की कौन से कपड़े किसके हिस्से में आने वाले हैं. सो एक आवाज़ में ही सारे लोग कमरे में जमा हो गए थे.
"ऐ सीमा , ये नीले रंग की साड़ी तो बहुत प्यारी है, मैं तो यही लूंगी
. मम्मी देखो ये पांच बनारसी और दो कांजीवरम साड़ियाँ शुची के लिए थी हैं न?"
"बहुत बढियां हैं. सुनील ने ही पसंद की है न ? बस शुची को भी पसंद आएगी."
" ये दो साड़ियाँ निशि के लिए और ये एक साड़ी और दो सूट के कपड़े रीना के लिए ये दो साड़ियाँ सीमा के लिए..............................
"ये कपड़े मेरे, ये सुनील के, ये के बच्चों के ..........."
साड़ियाँ तो सारी बँट गई मेरे लिए तो कोई साड़ी निकली ही नहीं. भूल गया है क्या मनीष? अरे हाँ अभी वो प्याजरंग की साड़ी तो रखी है शायद वही मेरे लिए लाये होंगे ये लोग.
" मम्मी ये साड़ी तुम्हारी- रंग अच्छा है न , तुम्हारे लिहाज से तो ठीक ही है "
मनीष एक एकदम हलके क्रीम कलर की सिल्क की साड़ी मेरी तरफ बढ़ा रहा था और मैं? मैं न उसे ले पा रही थी और ना ही कुछ कह पा रही थी . मैं क्या इतनी बूढी हो गयी हूँ? क्या मैं अब कामदार साड़ियाँ पहनने के लायक नहीं रह गयी हूँ ? इन लोगों ने यह कैसे मान लिया की मेरी इच्छाएं मर गयी हैं जो कुछ ये पहना देंगे मैं पहन लूंगी? सीमा, निरीह भाव से मुझे देखने लगी थी.
" ये एक कांजीवरम साड़ी बच रही है.........
" अरे वाह ! बच रही है तो क्यों न मैं ही लेलूँ"
' निशि मैं सोच रही थी कि ये साड़ी भाभी के लिए ठीक रहेगी"
" मम्मी के लिए? अरे अब इस उम्र में मम्मी इसे क्या पहनेंगी? है न मम्मी?"
" हाँ तुम्ही ले लो."
कह दिया था मैंने लेकिन मन बेहद दुखी हो गया था . उम्र के साथ-साथ इच्छाएं भी मर जाती हैं ; ऐसा हमारे युवा होते बेटे, बेटियाँ, बहुएं क्यों सोचने लगते हैं? फिर मैं अभी पचपन की ही तो हूँ. फिर मुझे अच्छे अच्छे कपड़े, साड़ियाँ पहनने का शौक भी बहुत है. अनावश्यक श्रृंगार तो मुझे वैसे ही पसंद नहीं है. पैंतीस वर्ष बीत चुके हैं हम लोगों के वैवाहिक जीवन को . मैं बीस की थी जब हमारी शादी हुई थी एक बेहद सौम्य , सरल और आकर्षक व्यक्तित्व के धनी अनिल मुझे मिले थे. बेहद प्यार करने वाले . मैं खूब सज-संवर के रहूँ, अनिल की यही इच्छा रहती थी. अब तो अनिल भी बेहद चुप-चुप से हो गए हैं. घर में जो कुछ हो रहा है उसे बस निर्लिप्त भाव से देखते रहते हैं.
मन कैसा अजीब सा हो गया था. अपने भीतर आंसुओं का सैलाब सा उमड़ता महसूस किया था मैंने. धत! कैसी पगली हूँ मैं! ठीक ही तो कहते हैं लड़के. भला अब इस उम्र में मैं कामदार साड़ियां पहनूंगी? सांत्वना दी थी मन को. अब जिनके साथ रहना है, उस नई पीढ़ी के साथ एडजस्ट करके ही चलना होगा, वर्ना उनका क्या है, मैं ही आंसू बहाती , मानसिक व्यथा लिए रहूंगी.
शाम को अनिल ने ऑफिस से लौटते ही मुझे आवाज़ दी थी.
"तुम्हारे लिए साड़ी लाया हूँ. वैसे मनीष तो ले ही आया होगा लेकिन ये मेरी तरफ से. शादी वाले दिन यही पहनोगी तुम."
बेहद प्यारी गुलाबी रंग की ज़री के काम वाली सिल्क साड़ी थी.
" लेकिन अब इस उम्र में ये साड़ी पहनते अच्छी लगूंगी क्या?"
"क्यों? इस उम्र से तुम्हारा क्या मतलब है? तुम बूढी हो गई हो क्या? अरे तुम तो अपनी बहू से कहीं ज्यादा अच्छी लगती हो, अभी भी."
और दिन भर के जमा हुए आंसूं सारे बाँध तोड़ के बह निकले थे. अनिल की साड़ी को आँखों से लगा, फूट-फूट के रो पड़ी थी मैं. और अनिल पूरे वाकये से अनजान, परेशान , मेरे रोने से हतवाक खड़े थे. उनकी समझ में नहीं आ रहा था की अचानक मुझे क्या हुआ? लेकिन मैं जानती थी की अब इस साड़ी को लेकर मेरा और अनिल का अच्छा ख़ासा मज़ाक बनाया जाएगा. " बुढापे का प्रेम" कह कर खिल्ली उड़ाई जायेगी. खुद हमारे बच्चे ही हमारा मज़ाक उड़ायेंगे.
जब तक ये तीनों होस्टल में रह कर पढ़ रहे थे, तब तक हम लोगों को अपनी उम्र का अहसास ही नहीं था. लेकिन अब कदम-कदम पर हमें उम्र का अहसास कराया जाता है.
घडी ने चार बजने का संकेत दिया था. अरे!! तो क्या सारी रात मैंने जागते हुए ही गुज़ार दी? मैं अपने प्रति ही ग्लानि से भर उठी थी. सच तो है. बुढ़ापा तो आ ही गया है मेरा. मैं महसूस नहीं कर पाती लेकिन देखने वाले तो महसूस करते हैं न. बच्चे मेरी उम्र के हिसाब से काम करते हैं तो इसमें गलत क्या है? आखिर मैं अपनी उम्र को स्वीकार क्यों नहीं कर पाती? और सचमुच मन को बड़ी शान्ति मिली थी इस विचार मात्र से.
" मम्मी, कितनी देर से जगा रही हूँ. आठ बज रहे हैं. तुम्हारे बिना तो कुछ होने का नहीं. उठो न जल्दी."
रीना जगा रही थी. चाय पर सब मेरा ही इंतज़ार कर रहे थे. लेकिन सब मेरी और ऐसे क्यों देख रहे हैं? आज आठ बजे तक सोती रही तो जैसे कोई अनहोनी हो गई! सब तो रोज़ ही आठ बजे तक सोते हैं. मन फिर उदास हो गया था. आखिर ये सब मुझे समझते क्या हैं? इन सब के लिए मेरी हैसियत क्या है?
घर में शादी का माहौल था. वातावरण में खिलखिलाहटें और कहकहे घुले-मिले रहते थे. लेकिन मेरा मन खिन्नता से भरा रहता था. सबसे झल्ला के बोलती थी. हमेशा बडबडाती रहती थी. और शायद इन सभी के हंसी-ठहाकों के बीच मैं ही तनाव पैदा करती थी.
कल बारात जाने वाली थी. घर में बड़ा अच्छा लग रहा था. सुनील भी हल्दी लगाए पूरे घर में घूम रहा था. बहुत खुश था लड़का. आखिर शुचि से किया हुआ वादा जो पूरा हो रहा था उसका. मैं भी खुश थी क्योंकि मैंने तय कर लिया था की मैं अनिल की लाई कामदार साड़ी ही पहनूंगी. चाहे कोई कुछ भी कहे.
बड़े जतन से अपने बालों में छिटकी चांदी को डाई करके काले बालों में मिलाया. चेहरे को मलाई से चमकाया. बारात उसी शहर में जानी थी सो सारे काम इत्मीनान से निपटा रही थी. ज़री से जगमग होती साड़ी पहनी. उसके साथ मैच करते आभूषण भी पहने. और अब बेहद खुश थी की मैं निशि से ज्यादा अच्छी लग रही हूँ. अनिल ने मुझे देखा, बोले कुछ नहीं( लो भला!! तारीफ़ तक नहीं कर सकते?) बच्चों ने भी कुछ नहीं कहा. न कहें. जलते हैं मुझसे. घर के अन्य मेहमान तो तारीफों का पुलिंदा बाँध रहे हैं न? यही काफी है. अपनी सज्जा के बल पर लगभग पांच वर्ष छुपा लिए थे मैंने अपनी उम्र के . और अब अपनी भावी समधिन , जिनकी सुन्दरता के बहुत कशीदे सुनील काढता रहता है, का मुकाबला करने को तैयार थी.

बारात शुचि के दरवाजे पर पहुँच गई थी. मेरी नज़रें बस शुचि की माँ को ही तलाश कर रही थीं. जो भी गहनों, जडाऊ साड़ी से लकदक महिला दिखती , तो मैं सोचती की यही है क्या शुचि की माँ?
" हम सब की और से ढेरों ढेर बधाईयाँ, शुभकामनाएं स्वीकार कीजिये."
इस आवाज़ ने तन्द्रा भंग की थी मेरी.
अरे!!! यही है क्या शुचि की माँ? सिल्क की क्रीम, लाल बोर्डर की साड़ी पहने, माथे पर सिन्दूर की लाल बड़ी सी बिंदी लगाये, बालों को एक ढीले से जूड़े के रूप में लपेटे, सर पर पल्लू लिए हुए मेरे सामने एक बेहद सौम्य महिला खड़ी थी. मेरे दोनों हाथ अपने आप अभिवादन में जुड़ गए. उनहोंने बड़े प्यार से मेरे हाथों को थाम लिया था, और भीतर ले चलीं थीं.
उस सादगी भरे व्यक्तित्व में कैसा गज़ब का आकर्षण था! वहां ढेरों जडाऊ साड़ियों के बीच उनका सादा वस्त्रों में लिपटा मोहक व्यक्तित्व अलग ही दिपदिप कर रहा था. मेरे मुंह से शर्म के मारे शब्द ही नहीं निकल रहे थे. वे भी तो मेरी ही उम्र की हैं, लेकिन कितनी सरल, सौम्य और सादगी से भरपूर. एक मैं हूँ, जो अपनी उम्र को ताक पे रख के गहनों, साड़ियों के पीछे दौडती फिरती हूँ.
मेरे गहने मुझे काटने लगे थे. मेरी भारी साड़ी जो अभी तक अपने रेशमी अहसास से मुझे आनंदित कर रही थी, अब चुभने लगी थी. मुझे लग रहा था की मेरे सफ़ेद बाल जिन्हें मैंने बड़े जतन से काला किया है, अपनी पूर्णता के साथ झलकने लगें. मैं वही मनीष की लाई साड़ी पहन लूं.
सचमुच बच्चे सही मूल्यांकन करते हैं हमारा, हमारी उम्र का और उसके हिसाब से होने वाले प्रत्येक कार्य का. आज मुझे अपनी उम्र का भरपूर अहसास हुआ था. मैं खुद उसे महसूस करना चाहती थी आज, अभी, इसी वक्त.
मुझे लगा था की बुढ़ापा दस्तक देने लगा है. नहीं..........दस्तक देने के बाद आधा सफ़र भी तय कर चुका है..