मंगलवार, 21 दिसंबर 2010

मेरी पसंद....


बसन्त
और बसन्त फिर आ रहा है
शाकुन्तल का एक पन्ना
मेरी अलमारी से निकलकर
हवा में फरफरा रहा है
फरफरा रहा है कि मैं उठूँ
और आस-पास फैली हुई चीज़ों के कानों में
कह दूँ 'ना'
एक दृढ़
और छोटी-सी 'ना'
जो सारी आवाज़ों के विरुद्ध
मेरी छाती में सुरक्षित है

मैं उठता हूँ
दरवाज़े तक जाता हूँ
शहर को देखता हूँ
हिलाता हूँ हाथ
और ज़ोर से चिल्लाता हूँ –
ना...ना...ना
मैं हैरान हूँ
मैंने कितने बरस गँवा दिये
पटरी से चलते हुए
और दुनिया से कहते हुए
हाँ हाँ हाँ...
केदारनाथ सिंह

रविवार, 17 अक्तूबर 2010

सब जानती है शैव्या....

" माननीय मुख्य अतिथि महोदय, गुणीजन, सुधिजन, राज्य शासन द्वारा दिया गया यह सर्वोच्च सम्मान , केवल शैव्या जी का सम्मान नहीं, वरन मेरा, आपका, हम सबका सम्मान है, पूरे क्षेत्र का सम्मान है. पूरी नारी जाति का
सम्मान है. उनके सम्मानित होने से हमारे अखबार में चार चांद लग गये हैं. हमारा सर गर्व से ऊंचा उठ गया
है......."
मंच पर अन्य अतिथियों के साथ बैठी शैव्या के चेहरे पर एक कड़वी मुस्कान उभरी थी, माथुर के इस स्तुति गान के साथ . हर शब्द के साथ पीछे लौटती जा रही थी शैव्या .
पन्द्रह साल पहले जब इस अखबार के दफ़्तर में कदम रखा था उसने, तब माथुर ने ही फ़िकरा कसा था-
" अच्छा... तो अब लड़कियां भी पत्रकारिता करेंगीं?"

कुल अट्ठाइस लोगों को बुलाया गया था इन्टरव्यू के लिये, जिनमें सत्ताइस लड़के थे. धड़कन तो सुबह से ही बढ गई थी शैव्या की, यहां आकर निराशा बढी थी. २७ लड़के और वो अकेली लड़की!! पता नहीं क्या होगा?
साक्षात्कार के दौरान भी सम्पादक ने कुछ खास पूछा ही नहीं. यहां-वहां की बातें कीं, लेखन से जुड़ी,
माज से जुड़ी, बस. तीन दिन बाद नियुक्ति-पत्र मिला तो खुशी से उछल पड़ी थी शैव्या. वैसे पता नहीं क्यों, उसे उम्मीद थी, खुद के चुने जाने की.
पहला दिन कैसे भूल सकती है शैव्या?
अखबार के कामकाज से अनभिज्ञ शैव्या ने ऑफ़िस में कदम रखा तो आठ जोड़ी आंखें उसका मुआयना करने लगीं, राष्ट्रीय-अन्तर्राष्ट्रीय पृष्ठ के सम्पादक थे माथुर, उन्ही के अन्डर में काम करना था शैव्या को. व्यंग्य भरी मुस्कान के साथ माथुर ने कुर्सी की तरफ़ इशारा किया था. बिल्कुल अच्छी नहीं लगी थी उसे ये मुस्कान.
शैव्या ने नोटिस किया, कि बाकी लोगों के होठों पर भी कुछ इसी तरह की मुस्कान चस्पां थी. शैव्या के बैठते ही माथुर ने टेलीप्रिंटर के पांच-सात न्यूज़-रोल उसकी टेबल पर पटक दिये ." सारे समाचार काट-काट के रखिये, और पेज़ पर जाने लायक इम्पोर्टेंट न्यूज़ की कटिंग अलग करती जाइए. मैं आता हूँ अभी."
कह के माथुर बाहर निकल गए. उलझन में पड़ गई शैव्या . उसे तो रोल की हर न्यूज़ ख़ास लग रही थी! किसे रख ले किसे फेंक दे?
चार बड़े-बड़े बंच बन गए थे खबरों के...
उधर माथुर ने आते ही उसे डांटना शुरू कर दिया.
"ये क्या? अभी तक एक भी समाचार नहीं बना पाईं आप? तीन बजे तक पूरे पेज का मैटर दे देना होता है और आप गड्डियाँ लगा रही हैं...? "
माथुर की बुदबुदाहट में " पता नहीं कहाँ से चले आते हैं..." साफ़ सुनाई दिया था उसे.
इतना अपमान तो कभी किसी ने किया ही नहीं था शैव्या का! स्कूल-कॉलेज में हमेशा रैंक-होल्डर रही... अभी तक तो केवल तारीफ़ ही सुनी थी उसने अपनी. आंसू आ गए उसके.
" यार तुम भी न. आज पहले दिन आई है लड़की, और तुमने पूरा काम सौंप दिया. थोडा थोडा करके सिखाओ भाई."
पांडे जी को बुरा लग था शायद. उम्रदराज़ भी थे, इसीलिये माथुर को डपट दिया उन्होंने. पांडे जी की समझाइश पर बुरा सा मुंह बना लिया था माथुर ने.
" लीजिये, हैडिंग बनाइये . एस सी , इनकी डीसी, और इन दोनों की टीसी हैडिंग बनाइये."
अब ये क्या नई मुसीबत है? हैडिंग तो ठीक है, लेकिन ये एससी, डीसी और टीसी ....? शैव्या
को लगा, नहीं कर पाएगी यहाँ काम. पत्रकार बनने का सपना टूटता नज़र आया उसे. कैसे कर पाएगी? जब कोई सिखाने वाला ही नहीं?
" Hello young lady, What's going on? How is day going? Got some work?"
ओह... ... आय’म महेन्द्र, महेन्द्र काले. "
लगभग बुज़ुर्ग से महेन्द्र काले बहुत अपने से लगे उसे.
" अभी तक तो कुछ भी समझ में नहीं आया सर . माथुर सर ने कुछ समझाया ही नहीं. ये हैडिंग्स
दीं हैं बनाने के लिए, लेकिन मुझे नहीं
मालूम , इन्हें बनाने का तरीका क्या है."
एक बार में ही पूरी भड़ास निकाल दी शैव्या ने. गाय बन के रहना तो उसे वैसे भी नहीं पसंद.
तमक के देखा था माथुर ने शैव्या को. ऐसी उम्मीद नहीं थी शायद उसे.

" क्या माथुर,..... अपनी सीनियोरिटी झाड़ने के लिए ये बच्ची ही मिली तुम्हें? कुछ सिखाओगे
नहीं, तो उसे समझ में कैसे आएगा? सिखा नहीं पा रहे हो, तो अलग बात है."
महेंद्र काले कार्यकारी सम्पादक थे. वरिष्ठ थे, और प्रथम पृष्ठ देखते थे.
काले सर ने सिखाया और ख़ास-ख़ास बातें शैव्या केवल तीन दिन में सीख गई.
तीसरे
महीने
तो उसे इसी पृष्ठ का स्वतन्त्र प्रभार भी दे दिया गया.
मुख्य सम्पादक उसकी कार्य-शैली से इतने प्रसन्न की तमाम ख़ास रिपोर्टिंग उसके जिम्मे
करते चले गए.
" आदिवासी जनजाति बहुल इस क्षेत्र की समस्याओं पर इस रिपोर्ट के पहले कभी इतनी
गहराई से प्रकाश नहीं डाला गया . सच्चा पत्रकार वही है, जो अपनी कलम की सार्थकता सिद्ध
कर सके. शैव्या जी की कलम ने आज उस क्षेत्र की ओर ध्यान आकर्षित करवाया है, जिसका
सामाजिक नक़्शे में से लोप ही हो चुका था. शासन की ओर से बहुत जल्द इस इलाके को
मूलभूत सुविधाएं मुहैया कराई जायेंगीं. और प्रशासन से आग्रह है कि वह इसे सुचारू रूप से
क्रियान्वित करवाए. "

मंत्री जी के मुंह से अपना नाम सुन के शैव्या की तन्द्रा भंग हुई .
शैव्या की सफलता से प्रसन्न हो, प्रबंध सम्पादक ने उसका नाम कार्यकारी सम्पादक के लिए
प्रस्तावित किया, जिसे काले सर ने, जो अब मुख्य सम्पादक थे, सहर्ष स्वीकार कर लिया.
उपसंपादक के रिक्त पड़े पद पर कल ही नई नियुक्ति हुई थी. आज एक नई
लड़की उसी जगह आने वाली थी, जहाँ पंद्रह साल पहले शैव्या आई थी.
घर में मन ही नहीं लग रहा था उसका. ड्यूटी तो तीन बजे से शुरू होती थी, लेकिन शैव्या
को लग रहा था कि वो अभी ही प्रैस चली जाए. वही माथुर........वही नई भरती.......
यंत्रवत शैव्या तैयार हुई, और ऑफिस पहुँच गई. माथुर की टेबल के सामने भी बेखयाली में ही
पहुँच गई.

" माथुर जी, नई भरती है, पहले उसे एससी , डीसी, टीसी के मायने बता दें, हैडिंग बनाने का
तरीका भी....."

अवाक हो कर माथुर शैव्या को और मुस्कुराती हुई आठ जोड़ी आखें माथुर

को देख रहीं हैं, शैव्या जानती है.

( सभी चित्र गूगल सर्च से साभार)

मंगलवार, 21 सितंबर 2010

मेरी पसंद....


दुष्यंत कुमार

मत कहो, आकाश में कुहरा घना है,
यह किसी की व्यक्तिगत आलोचना है ।

सूर्य हमने भी नहीं देखा सुबह से,
क्या करोगे, सूर्य का क्या देखना है ।

इस सड़क पर इस क़दर कीचड़ बिछी है,
हर किसी का पाँव घुटनों तक सना है ।

पक्ष औ' प्रतिपक्ष संसद में मुखर हैं,
बात इतनी है कि कोई पुल बना है

रक्त वर्षों से नसों में खौलता है,
आप कहते हैं क्षणिक उत्तेजना है ।

हो गई हर घाट पर पूरी व्यवस्था,
शौक से डूबे जिसे भी डूबना है ।

दोस्तों ! अब मंच पर सुविधा नहीं है,
आजकल नेपथ्य में संभावना है ।

रविवार, 8 अगस्त 2010

रमणीक भाई नहीं रहे.......

"रमणीक भाई ठक्कर नहीं रहे "....... अखबार के नगर पृष्ठ का मुख्य समाचार था ये आज .
' अरे!! रमणीक भाई नहीं रहे!! अब क्या होगा? ' समाचार पढ़ के आभा चिंतित हो उठी.
' क्या होगा माने ? आखिर जिंदा रहने की भी कोई लिमिट होती है. अट्ठासी साल के तो हो ही गए थे, और कितना जिंदा रहते? '
आम ख़बरों की तरह इसे भी अभय ने सहजता से स्वीकार कर लिया था. अस्वीकार की कोई गुंजाइश तो आभा के पास भी नहीं थी, लेकिन चिंता अब उसे ठक्कर परिवार की थी, जिसकी कमान पूरी तरह रमणीक भाई के हाथ में थी.
इस उम्र में भी गजब की फुर्ती और दिमाग था उनके पास. क्या मजाल कि दो दुकानों में से किसी एक पर भी कोई गड़बड़ हो जाए? साठ - साठ साल के लड़के हो गए, लेकिन अभी भी पिता की दी हुई "खर्ची" पर निर्भर !
कहीं भी आना-जाना रमणीक भाई ही तय करते थे. वो चाहे बहुओं को मायके जाना हो, किसी शादी-ब्याह में , या फिर किसी गमी में ही क्यों न जाना हो. रमणीक भाई तय करेंगे, कि बहुएं कब मायके जाएँ . आने-जाने के लिए और अन्य खर्चों के लिए पैसा भी देंगे .
घर में सबको "खर्ची" देंगे, मगर एक एक पैसे का हिसाब भी लेंगे.
कभी-कभी आभा को बड़ी ईर्ष्या होती थी, ठक्कर परिवार के बहु-बेटों से. सोचती थी, कि क्या किस्मत पाई है, इन लोगों ने. इतनी उम्र हो गई, लेकिन कोई ज़िम्मेदारी नहीं. सारा काम पिता सम्हालते हैं. न राशन की चिंता, न महीने भर के 'बिलों' की. एक वो है, जिसे वेतन बाद में, बिल पहले मिलने लगते हैं. आभा की शादी के एक साल बाद ही उसके ससुर ने अभय से साफ़ शब्दों में कहा था कि अब अपने परिवार की ज़िम्मेदारी वो खुद उठाए. अपने फैसले खुद ले. कब तक उन पर निर्भर रहेगा?
एक वो थे, एक रमणीक भाई हैं!!
शहर के प्रतिष्ठित कपडा व्यवसायी थे रमणीक भाई. ग्राहकों का विश्वास इस कदर, कि चालीस साल पुराने ग्राहक भी उनकी दुकान से ही कपडा लेना पसंद करते थे.
तीन बेटे हैं रमणीक भाई के, जिनमें से दो अब बुज़ुर्ग हो चुके हैं, तीसरा बुजुर्गियत की पायदान पर है. बड़ी समझ-बूझ के साथ रमणीक भाई ने तीनों बेटों के लिए शानदार घर बनवाये, एक ही अहाते में. न केवल घर बनवाये, बल्कि एकदम एक जैसा फर्नीचर भी बनवाया. हर्षा बेन जब
आभा को अपना घर और फर्नीचर दिखाने ले गईं थीं, तो लौट के कई दिनों तक आभा को ठीक से नींद नहीं आई थी. मन ही मन पता नहीं कितना झल्लाई थी अपने ससुर पर, साथ ही अभय पर, जो अपनी कमाई से घर खरीदने का सपना संजोये बैठा है.
पता नहीं कब खरीदेगी अपना घर.
इतना सब करने के बाद भी रमणीक भाई के बेटे खुश नहीं हैं हैं. कारण? उनकी पत्नियां नाखुश, तो बेटे कैसे खुश रह सकते हैं?
हर्षा बेन जब भी आभा के पास आतीं, तो ससुर की शिकायतों का पुलिंदा साथ लातीं. सुनते-सुनते आभा थक जाती, लेकिन हर्षा बेन की जुबान न थकती.
" अरे आभा दी, कामना मैके जा रही थी, तो बाबू ने बीस हज़ार दिए थे, मेरे को जाना है, तो दस दिखाने लगे. मैं तो बोल दी, मेरे को जानाई नईच है."
" दस-दस हज़ार खर्ची देते हैं, कैसे होगा इतने में? समझतेइच नईं हैं."
शिकायत करते हुए हर्षा बेन की गोरी नाक लाल हो जाती.
आभा को अचरज होता-
" लेकिन भाभी दस हज़ार में महीने भर के खर्चे ..... कैसे होता होगा? "
" अरे नईं आभा दी. पूरा राशन तो बाबू ही भरवाते हैं. बिजली का बिल, टेलीफोन का बिल, बाइयों की तनख्वाह, बच्चों की स्कूल फीस सब बाबू........................."
हर्षा बेन गिनातीं जा रहीं थीं, और आभा सोच में डूबती जा रही थी कि जब सब बाबू ही करते हैं , तो दस हज़ार जो केवल जेबखर्च है, कम कैसे पड़ जाता है? यहाँ दस हजार में तो लोग पूरा घर चलाते हैं........ कितनी निश्चिन्त ज़िन्दगी है, ठक्कर परिवार की.....सारे तनाव बाबू के....
तब भी कहाँ संतुष्ट है तीनों बेटे-बहुएं?
आभा अभी भी चिंता में है, अब क्या होगा ? जो लड़के उनके रहते अलग-अलग कारोबार करने को फडफडा रहे थे, अब आज़ाद हो गए...
एक महीना हो गया था . इस बीच व्यस्तता कुछ ऐसी बढ़ी , कि न आभा हर्षा बेन की खबर ले सकी, और न ही हर्षा बेन ने कोई खबर दी. कल अचानक ही हर्षा बेन बाज़ार में दिखीं तो आभा पहचान ही नहीं पाई.
" क्या हुआ हर्षा भाभी? तबियत ठीक नहीं है क्या? "
" तबियत तो ठीक है, लेकिन बाकी सब खराब है. बड़ी दूकान मंझले भैया बाबू के साथ सम्हालते थे, और छोटी को दो भाई सम्हाल रहे थे, तो अब मंझले भैया ने उस दूकान पर कब्ज़ा ही कर लिया. एक पैसा भी उस दूकान के कारोबार में से देने को तैयार नहीं. अब एक दूकान में हम दो परिवार कैसे चलेंगे?
कितना खर्च है घर का, अब समझ में आ रहा..." बाज़ार में ही अपना दुखड़ा रोने लगीं थीं वे.
हर्षा भाभी के चेहरे पर उभर आई झांइयों का राज, आभा की समझ में आ गया था.
" बाबू हमेशा व्यापार का काम खुद देखते रहे, सो इन भाइयों को पता ही नहीं, क्या कैसे करना है? "
हमेशा बाबू की योजना पर काम करते रहे, कभी खुद तो कोई योजना बनाई ही नहीं......"
नाक के साथ-साथ कान भी लाल हो उठे थे हर्षा बेन के.
सच है. कर्मचारी की तरह काम करने और मालिक की तरह व्यापार चलाने में बहुत अंतर है.
आभा समझ ही नहीं पा रही थी, कि बाबू ने अच्छा किया या बुरा? बेटों को व्यापारिक मामलों से दूर रखा, अपने पैरों पर खड़ा ही नहीं होने दिया, अब? साठ वर्ष की उम्र तक पिता पर निर्भर रहने वाले बेटे अब मुनीम और दूकान के दूसरे नौकरों पर निर्भर हैं! उनके अपने बच्चे भी व्यापारिक बुद्धि के नहीं हैं.
क्यों किया बाबू ने ऐसा? क्यों नहीं अपने बच्चों को स्वतन्त्र व्यक्तित्व बनने दिया? अपना दबदबा क़ायम रखने के एवज़ में, अपने ही बच्चों को अपंग कर दिया?
आभा को लगा, कितनी सुखी है वो, अपने छोटे से परिवार और सीमित आय में भी. पहली बार आभा ने कृतज्ञ नज़रों से देखा पापा की तस्वीर को....

चित्र गूगल सर्च से साभार.

शुक्रवार, 9 जुलाई 2010

मेरी पसंद....

जिन्हें अच्छे बुरे हर हाल में रब याद आता है

भुलाना चाहता हूं मैं मगर सब याद आता है
तेरी यादों ने बख़्शा है जो मन्सब याद आता है

सितम बे-महर रातों का मुझे जब याद आता है
इन्हीं तारीकियों में था जो नख़्शब याद आता है

हर इक इंसान उलझा है यहां अपने मसाइल में
परेशां और भी होंगे किसे कब याद आता है

दलीलों के लिए तो सैकड़ों पहलू भी हैं लेकिन
जो सोचूं तो मुझे अच्छा बुरा सब याद आता है

वहां की सादगी में दर्स है रिश्तों की अज़मत का
जिसे तुम गांव कहते हो वो मकतब याद आता है

लिया है काम ऐसे भी सियासत ने अक़ायद से
उठाने हों अगर फ़ितने तो मज़हब याद आता है

हैं बंदे तो सभी लेकिन वो मोमिन हो गए ’शाहिद’
जिन्हें अच्छे बुरे हर हाल में रब याद आता है

शाहिद मिर्ज़ा "शाहिद"

मंगलवार, 15 जून 2010

नीरा जाग गयी है....

आज फिर घर में बड़ी चहल-पहल थी. पूरा सामान उलट-पुलट किया जा रहा था. पापा व्यस्त थे. माँ व्यस्त थीं. छोटी बहनें चहक रहीं थीं, बस नीरा चुप थी. देख रही थी चुपचाप . किसी ने कोई काम बताया तो कर दिया, बस इतना ही. सबके चेहरों पर ख़ुशी थी , लेकिन नीरा का चेहरा शांत था. सरोकारहीन, निर्लिप्त सी घूम रही है.कभी इधर तो कभी उधर. वैसे किसी को इस बात का ख़याल भी नहीं था कि नीरा कहाँ है, क्या कर रही है? जबकि ये सारा सरंजाम उसी के लिए किया जा रहा था.
चुपचाप बालकनी में आ गई नीरा.
नीरा, जो शहर के सरकारी हायर सैकेंडरी स्कूल के प्राचार्य सुशील पांडे की बेटी है, नीरा, जिसकी माँ बेहद सुघड़ और शालीन है, लेकिन अब परिस्थितिवश नीरा पर झुंझला उठती है. नीरा, जिसकी दो छोटी बहने और एक भाई है, जो उसे बहुत प्यार करते हैं, लेकिन अब जो स्थितियां घर में बन रहीं हैं, जो तनाव घर में छाया रहता है, उसके लिए नीरा को ही दोषी मानने लगे हैं.
और नीरा???
यह वही लड़की है, जिसने चार साल पहले जीवविज्ञान में एमएससी किया है, जिसने शुरू से लेकर अंत तक सारी परीक्षाएं प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की हैं, और बीएड करने के बाद एक प्रायवेट स्कूल में २००० रुपयों की नौकरी कर रही है, अब छब्बीस साल की हो गई है, लेकिन अभी तक उसकी शादी नहीं हो सकी है.
बस!!! सारी चिंताओं की जड़ यही है.
नीरा साधारण शक्ल-सूरत की लडकी है लेकिन आकर्षक है. रंग थोडा दबा हुआ लेकिन चमकदार है, फिर भी अब तक जितने भी रिश्ते आये , सब दबे हुए रंग और साधारण सूरत के चलते वापस हो गए. सब के सब घर जा कर जवाब देने की बात कह कर गए और चुप्पी साध गए. पहली बार नीरा के पापा ने फोन करके लड़के वालों का जवाब जानना चाहा था, लेकिन उसके बाद जब भी लड़के वाले बिना जवाब दिए गए, पांडे जी उनका जवाब खुद ही समझ जाते.
पहली बार के इन्कार पर पांडे जी ने लड़के वालों की लानत-मलामत की. उन्हें नादान और इंसान को परखने में अक्षम बताया. दूसरी बार परेशान हुए, लेकिन तीसरी बार तो सीधा निशाना नीरा पर ही साधा. पता नहीं कितनी तरह से अयोग्य ठहराया गया उसे.
बालकनी में घूमती नीरा के दिमाग में केवल पिछली घटनाएं ही घूम रहीं हैं. अब तो इन लड़के वालों के नाम से दहशत सी होने लगी है उसे. एक तो कितनी बार उसने माँ से कहा है कि उसका मेकअप न किया करें. उसका चेहरा ऐसे बिना किसी प्रसाधन के ज्यादा अच्छा लगता है. लेकिन माँ मानती ही नहीं.
कभी भी झूठ का सहारा न लेने वाले माँ-पापा लड़के वालों के सामने धड़ल्ले से झूठ बोलते दिखाई देते हैं अब तो..............." ये कुशन इसी ने बनाए हैं...." बुनाई में तो बहुत होशियार है हमारी नीरा......"
" तरह-तरह के व्यंजन बनाने का बहुत शौक है नीरा को..."
" ये कचौरियां उसी ने बनाई हैं......."
जबकि सच तो ये है कि नीरा को कढाई के नाम पर केवल चेन-स्टिच आती है . नाश्ते जो लोगों को पेश किये जाते हैं, उनमें कुछ भी उसका बनाया नहीं होता.फिर फूलचंद भाजियावाले जैसे समोसे-कचौड़ी नीरा तो क्या कोई भी कुशल गृहिणी नहीं बना सकती. पूरे शहर में प्रसिद्धि है, इन समोसों-कचौरियों की . वो तो लड़के वाले बाहर से आते हैं इसलिए समझ नहीं पाते, वर्ना इस शहर के लोगों की तो जुबान पर स्वाद चढ़ा है इनका. एक बार में पहचान जाएँ......
और बुनाई???? बुनाई के नाम पर नीरा केवल उल्टा-सीधा बुन सकती है, वो भी तब तक जब तक स्वेटर में कुछ घटाने की बारी न आये. पिछली बार माँ राहुल का स्वेटर बना रहीं थी. पीछे का पल्ला नीरा को पकड़ा दिया था. नीरा ने किताब पढ़ते-पढ़ते जो बुनाई की, तो दो फंदे ऐसे छोड़ दिए, जिन्होंने पूरी बुनाई ही उधेड़ के रख दी. तब से लेकर आज तक माँ ने बुनाई के नाम पर नीरा को ऊन तक नहीं पकडाया होगा.
थक गई है नीरा ये झूठी बातें सुनते-सुनते. कितनी बार उसने माँ-पापा से कहा है कि उसकी झूठी तारीफें न किया करें. उसे पढने का शौक है, लिखने का शौक है, म्यूज़िक का शौक है, लेकिन ये सारी चीज़ें तो होने वाली बहू के गुणों में शामिल नहीं हैं न!! बस इसीलिये उसके इन गुणों का ज़िक्र तक नहीं किया जाता.
एक अच्छी बहू के गुण हैं- गोरा रंग, खूबसूरत चेहरा, नज़रे हमेशा नीची रखने वाली, हर बात सिर झुका के मानने वाली, पलट के जवाब न देने वाली, अपने विचार स्वयं तक सीमित रखने वाली, और हर कार्य में दक्ष .
लेकिन नीरा तो ऐसी नहीं है.एक बहू के लिए निर्धारित इन तथाकथित गुणों में से एक भी नहीं है उसमें. गलत बात तो नीरा को बर्दाश्त ही नहीं होती. किसी की भी हाँ में हाँ मिलना तो उसने सीखा ही नहीं है. अपने बेवाक विचारों की प्रस्तुति के कारण ही कॉलेज में उसका अच्छा प्रभाव था. वाद-विवाद प्रतियोगिताओं में हमेशा प्रथम स्थान मिलता रहा है उसे. कितने सर्टिफिकेट, कितने मेडल, कितने ईनाम...........लेकिन सब बेमानी. सब बेकार. पिछली बार यही तो कह रहे थे पापा-
" इनामों को चाटेंगे क्या ससुराल वाले? इसे कुछ घर का कामकाज सिखाओ भाई"
माँ ने भी जैसे पापा के आदेश को सिर-माथे लिया था. रसोई का हर छोटा-बड़ा काम सिखाने की कोशिश करतीं. हालाँकि इतनी मूर्ख नहीं थी नीरा. घरेलू काम काफी कुछ आते हैं उसे. सुघड़ तो है ही. काम चलाने लायक खाना भी बना लेती है. घर को सजा-संवार के रखना उसे अच्छा लगता है. बहुत सलीके से बातचीत करना आता है उसे. अगर फ्री हो के किसी मसले पर चर्चा करती है, तो सामने वाला हमेशा प्रभावित होता है उससे.
लेकिन लड़के वालों के सामने तो सिर झुकाए केवल हाँ में जवाब देते बैठे रहना पड़ता है उसे. कई बार तो उसकी मौजूदगी में हो रही सामजिक या राजनैतिक चर्चाओं में अपने विचार व्यक्त करने के लिए कसमसाती रह गई है वह. हमेशा " बिना मुंह की बिटिया है हमारी " जैसे पापा के स्लोगन का सिर झुका के पालन करती रही है, नीरा.
कितनी बार माँ-पापा से कहा है उसने कि अब ये दिखने-दिखाने का कार्यक्रम बंद करें. तीन बार रिजेक्ट हो चुकी है वह. अब बस. लेकिन ये लोग मानते कहाँ हैं?
" क्यों ? घर में बैठे रहने का इरादा है क्या?"
" छोटी बहनों का ख़याल नहीं है?"
"लोग क्या कहेंगे?"
जैसे जुमले अब बोलने के पहले ही उसे सुनाई देने लगते हैं. अब आज एक बार फिर घर संवारा जा रहा है. पापा इस बार कुछ ज्यादा ही खुश हैं. उन्हें जैसे पक्का भरोसा है कि बात बन ही जायेगी.
फिर पर्दे बदले जा रहे हैं. कुशन बदले जा रहे हैं. नई क्रॉकरी निकली गई है. राहुल को बता दिया गया है कि समोसे-कचौड़ी कब लाने हैं. मिठाई आ गई है.
पता नहीं कहाँ से आ रहे हैं ये लोग. शायद लखनऊ से. पहले तो नीरा को सब बताया जाता था, लेकिन इस बार तो लड़के कि फोटो तक नहीं दिखाई. सोचते होंगे, मना तो होना ही है, पूरा डिटेल बताने से क्या फायदा? नीरा ने भी इसीलिये कोई रूचि नहीं दिखाई, विवरण जानने में.
सोनी आ के नीरा को तैयार होने को कह गई है. शायद मेहमान आने ही वाले हैं. माँ आईं, आते ही, कैसे तैयार होना है, बता गईं. साडी-जेवर सब निकाल कर पलंग पर रख गईं हैं.
नहीं पहनेगी नीरा ये चमकदार साडी. नहीं पहनेगी इतने सारे जेवर. उकता गई है इस सारे दिखावे से. कितनी ही बार इन्ही जेवरों और ऐसी ही साड़ियों में पेश की जा चुकी है. आज तो नहीं ही पहनेगी. अपनी पसंद की हलके गुलाबी रंग की साडी और हल्का सा जेवर पहन लिया है उसने. आज कुछ भी उल्टा-सीधा बर्दाश्त नहीं करेगी नीरा. तय कर लिया है उसने.
नीचे से बुलावा आया तो नीरा चल दी ड्राइंगरूम की तरफ. पापा पिछले अनुभवों और आदत के मुताबिक़ नीरा की खूबियों का बखान करने में व्यस्त थे.
ड्राइंगरूम में आ गई थी नीरा.
"बैठो बेटी"
बैठ गई नीरा. धीरे से प्रस्तावित लड़के को देखने की कोशिश की. अरे बाप रे!!!! ये लड़का है? इतना उम्रदराज़??? क्या हो गया है पापा को? क्या सचमुच बोझ बन चुकी हूँ मैं?? सोचा नीरा ने. न. अब तो किसी की ज़बरदस्ती बर्दाश्त नहीं करेगी नीरा.
" बेटी क्या कर रही हो आजकल?"
" जी, पापा ने नहीं बताया?"
उलटे सवाल से हडबडा गईं तथाकथित लड़के की माता जी.
" कढाई, बुनाई, सिलाई, कुछ आता है?"
"नहीं:
"मगर तुम्हारे पापा तो बता रहे थे......"
"गलत बता रहे थे. यहाँ जो भी कुशन या टेबिल-क्लॉथ दिखाई दे रहे हैं, उन्हें मेरा बनाया न समझें. ये सब बाज़ार से
खरीदे गए हैं."
भावी वधु के जवाब से तिलमिलाई माताजी समझ ही नहीं पा रहीं थीं कि क्या पूछें?
" खाना बना लेती हो?"
"नहीं. बस दाल-चावल या एक-दो सब्जियां बना लेती हूँ. आप इसे काम चलाऊ कह सकतीं हैं लेकिन स्पेशल डिशेज़ बनाना मुझे नहीं आता. "
"मगर तुम्हारे पापा तो बता रहे थे..........'
"गलत बता रहे थे. ये समोसे-कचौड़ियाँ तो फूलचंद भजिया वाले के यहाँ से आये हैं. इतना अच्छा नाश्ता बनाना मुझे नहीं आता. "
हताशा भरा अंतिम सवाल आया माता जी का-
" जब ये सब घरेलू काम तुम्हें नहीं आते, इनका शौक ही नहीं है तुम्हें, तो फिर आखिर शौक किस चीज़ का है?"
" मुझे पढने, लिखने , खेलने, और अच्छा- अच्छा खाना खाने का शौक है. और अगर कोई कुछ सिखाए तो उसे सीखने का भी शौक है"
" मगर तुम्हारे पापा तो कह रहे थे कि तुम गाना......"
" गलत कह रहे थे. मुझे खुद गाने का नहीं, गाने सुनने का शौक है."
हक्के-बक्के से लड़के वाले एक-दूसरे की तरफ देख रहे थे और पापा? क्रोध नहीं था उनके चेहरे पर......कुछ राहत ही नज़र आ रही थी वहां भी.....शायद उम्र पाया दामाद उन्हें भी पसंद नहीं था.
पापा और माँ को शायद शर्मिंदा किया था नीरा ने लेकिन भविष्य में लगने वाली अपनी उस नुमाइश का अंत कर दिया
था उसने , जो लड़के वालों के इंकार के बाद नीरा को शर्मिंदा करती थी........लेकिन अब नहीं. अब नीरा जाग गई है.

शनिवार, 29 मई 2010

मेरी पसंद....

मेरे हमराह मेरा साया है
और तुम कह रहे हो, तन्हा हूँ

मैं ने सिर्फ एक सच कहा लेकिन
यूं लगा जैसे इक तमाशा हूँ

******************************

आंधी से टूट जाने का खतरा नजर में था
सारे दरख्त झुकने को तैयार हो गए

तालीम, जहन, ज़ौक, शराफत, अदब, हुनर
दौलत के सामने सभी बेकार हो गए

फिर यूँ हुआ कि सबने उठा ली क़सम यहाँ
फिर यूँ हुआ कि लोग ज़बानों से कट गए

सर्वत एम. जमाल
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जिसे सब ढूंढ़ते फिरते हैं मंदिर और मस्जिद में
हवाओं में उसे हरदम मैं अपने साथ पाता हूं

फसादों से न सुलझे हैं, न सुलझेगें कभी मसले
हटा तू राह के कांटे, मैं लाकर गुल बिछाता हूं

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ये चिंगारी दावानल बन सकती है
गर्म हवा में इसे उडाना, ठीक नहीं

देने वाला घर बैठे भी देता है
दर दर हाथों को फैलाना, ठीक नहीं

नीरज गोस्वामी
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कुछ सपन लेके आगे सरकती रही
उड़ न पाई कभी परकटी जि़न्‍दगी।

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न तो मेरे ख़त का उत्‍तर, न शिकायत, न गिला,
क्‍या हमारे बीच में रिश्‍ता बचा कुछ भी नहीं।

सुब्‍ह से विद्वान कुछ, सर जोड़ कर बैठे हैं पर,
मैनें पूछा तो वो बोले मस्‍अला कुछ भी नहीं ।

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एक कपड़ा मिल गया तो खुश ये बच्‍चे हो गये,
इनके कद से भी बड़ी इनकी कमीज़ें देखिये।

तिलकराज कपूर.
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मुश्किलों में कोशिशें मत छोड़िये कुछ कीजिये
इन ही तदबीरों से बदलेगा मुकद्दर देखना

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हां, मैं तुझसे हूं, मगर मेरा भी है अपना वजूद
पत्ते गिर जायेंगे तो, साया कहां रह जाएगा

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सब दोस्तों को जान गया हूं ये कम नहीं
दुश्मन की कोई अब मुझे पहचान हो न हो

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संदेश इनके प्यार का किसने चुरा लिया,
अंदेशा लेके आते हैं त्यौहार किसलिए ?

जब इसका इल्म था कि ये धोया न जायेगा,
मैला किया था आपने किरदार किसलिए ?

शाहिद मिर्ज़ा"शाहिद"
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गर प्यार न हो तो, ये जहां है भी नहीं भी
होंगे न मकीं गर,तो मकां है भी नहीं भी

लब बंद हैं ,दम घुटता है सीने में ’शेफ़ा’ का
हक़ कहने को इस मुंह में ज़बां है भी नहीं भी

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जो किसी के काम ही आए नहीं
हैफ़ ऐसी ज़िंदगी बेकार है,

भूल जाए गर ’शेफ़ा’ एख़्लाक़ियात
फिर तो तेरी ज़हनियत बीमार है

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मैं ने गर दे भी दिए सारे सवालों के जवाब
फिर भी कुछ ढूंढेंगे अह्बाब मेरी आँखों में

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उलझ न जाए कहीं दोस्त आज़माइश में
कि ख़्वाहिशें कभी तुम बेशुमार मत करना

इस्मत जैदी "शेफा कजगांववी"
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उम्र भर फल-फूल ले, जो छाँव में पलते रहे
पेड़ बूढ़ा हो गया, वो लेके आरे आ गए

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कठिन घड़ी हो, कोई इम्तिहान देना हो
जला के रखती है राहों में, माँ दुआ के चराग़

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अज़ीब शख़्स था, आँखों में ख़्वाब छोड़ गया
वो मेरी मेज़ पे, अपनी किताब छोड़ गया

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गर इजाज़त दे ज़माना, तो मैं जी लूँ इक ख़्वाब
बेड़ियाँ तोड़ के आवारा हवा हो जाऊँ
श्रद्धा जैन
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जिसकी जड़ें ज़मीन में गहरी उतर गईं
आँधी में ऐसा पेड़ उखड़ता नहीं कभी

मुझसा मुझे भी चाहिए सूरज ने ये कहा
साया मेरा ज़मीन पे पड़ता नहीं कभी

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बुझा रही है चराग़ों को वक़्त से पहले
न जाने किसके इशारों पे चल रही है हवा

गोविन्द गुलशन
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सौदा हुआ तो क्या हुआ दो कौड़ियों के दाम
सस्ता न इतना ख़ुद को बना दें तो ठीक है

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फुरसत मिले तो इनको ज़रा पढ़ भी लीजिए !
कुरान, बाईबल और गीता हैं बेटियां !!

नन्ही कली ओ बादे-सबा 'दर्द' की गज़ल !
क्या-क्या बताऊं आपको क्या-क्या हैं बेटियां !!
दर्द शुजालपुरी
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मंगलवार, 25 मई 2010

सफ़ाई की दरकार है यहां....


कोई मुम्बई जाये और हाजी अली की दरगाह पर ना जाये ऐसा हो सकता है क्या? हम भी पूरे भक्ति भाव से दरगाह पर गये। समन्दर के बीच स्थित यह दरगाह सिद्ध दरगाहों में से एक मानी जाती है। समन्दर के पानी को काट कर बनाया गया यह पवित्र स्थल लोगों ने इतना अपवित्र कर रखा है, कि दरगाह के प्रवेश द्वार से ही हर व्यक्ति को नाक बंद करनी पडती है। कचरा देख कर अफ़सोस होता है। प्रतिदिन जिस स्थान पर हज़ारों दर्शनार्थी मन्नत मांगने दूर-दूर से आते हों,उस स्थान की सफ़ाई व्यवस्था पर ध्यान देना ज़रूरी नहीं है क्या? यह तस्वीर तो मुझे मजबूरन उतारनी पडी, कम से कम कुछ लोग तो शर्मिन्दा हो सकें ,अपने द्वारा फैलाई गई इस गन्दगी को देखकर....

मंगलवार, 27 अप्रैल 2010

" हवा उद्दंड है........"




( मेरे कुछ वरिष्ठ जनों के आग्रह और आदेश पर मैं अपनी इस कहानी का पुनर्प्रकाशन कर रही हूं. मेरे जिन साथियों ने इसे पूर्व में पढा है, उनसे क्षमा याचना सहित)


"अन्नू..... उठ जाओ, छह बज गए हैं।"
मम्मी की आवाज़ के साथ ही मेरी आँखें खुल गई थीं। क्या मुसीबत है! ऐसे कडाके की ठण्ड में उठना होगा! यदि इस वक्त ज़रा भी आलस किया तो 'बस ' के समय तक तैयार होना बड़ा मुश्किल होगा। बस का ख्याल आते ही एक झटके से रजाई फ़ेंक उठ खड़ी हुई थी मैं। सर्दियों में तो सचमुच ही सुबह उठना बहुत अखरता है। भइया और गिन्नी मेरी छोटी बहन को सोते देख बड़ी ईर्ष्या होती है, उनसे। भइया तो वैसे भी धुरंधर सुबक्कड़ हैं। यदि उन्हें दस बजे ऑफिस न जाना हो, तो बारह बजे तक सोते ही रहें।
जब तक मुझे नौकरी नहीं मिली थी, सोचती थी कि कितना शुभ दिन होगा, जब मुझे नौकरी मिलेगी! तब नौकरी के समानांतर चलने वाली अन्य समस्याओं पर गौर ही कहाँ किया था! उनकी जानकारी ही कहाँ थी मुझे!शुरू के दिनों में कैसे उत्साह से गई थी कॉलेज , और अब!!अब तो जाने के नाम से ही कांटे से उग आते हैं शरीर पर ।
जैसे-तैसे नाश्ता कर, बस-स्टॉप की ओर भागी थी। बस अभी आई नहीं थी। बस-स्टॉप पर एक विशालकाय इमली का पेड़ था, जिसकी छाया में हम रोज़ अप-डाउन वाले बस का इंतज़ार किया करते थे। लेकिन मुझे वहां खड़ा होना बड़ा अजीब लगता था। मेरा पूरा वक्त घड़ी देखते या फिर अपने बैग को दोनों हाथों में बारी-बारी से बदलते बीतता।

मुझे स्टॉप पर पहुंचे अभी दो मिनट ही हुए होंगे, की एक लड़का बड़ी तेज़ साइकलिंग करता हुआ मेरे बहुत करीब से गुज़र गया ; इतने करीब से कि मैं चौंक कर दो कदम पीछे हट गई। यदि मैं पीछे न हटती तो निश्चित रूप से वह साइकिल मुझ से टकरा जाती। मेरे इस तरह पीछे हटने पर , थोडी ही दूरी पर खड़े तीन-चार लड़के हो-हो कर हंसने लगे। क्रोध और विवशता से बस होंठ भींच कर रह गई मैं।

आजकल के किशोरवय प्राप्त लडके इतने असभ्य और उद्दंड हो गए हैं कि इनके लिए कुछ कहने को मेरे पास तो शब्द ही नहीं हैं.लगता है, आजकल की हवा ही उद्दंड हो गई है। जिस लड़के को छूती है, उसी के पर निकल आते हैं।
बस आ गई थी। भीड़ का रेला बस की ओर दौड़ पड़ा था। इस रेलमपेल में दबी हुई मैं भी किसी तरह बस में चढ़ने में सफल हो गई थी। सारी सीट्स भर चुकीं थीं । खड़े रहने के सिवा कोई चारा न था। आगे एक प्रौढ़ सज्जन खड़े थे, सो उसी जगह को उपयुक्त समझ कर मैंने भी अपने लिए वहीं जगह बना ली थी। एक झटके के साथ बस चल पड़ी थी। इस बस का टाइम ऐसा था की साइंस कॉलेज वाले अधिकतर लड़के-लड़कियां इसी बस से जाते थे। ड्राइवर जब ब्रेक लगाता तो कुछ इस तरह कि बस को जोरदार झटका लगता , जिससे बस में खड़ा प्रत्येक व्यक्ति असंतुलन की अवस्था में आ जाता और इस समय पीछे खड़े लड़के मौके का फायदा उठाते हुए लड़कियों को अपने हाथ का सहारा दे लेते, जबकि आगे खड़े लड़कों पर लड़कियां ख़ुद ही जा गिरतीं। ड्राइवर को झटकेदार ब्रेक की ताकीद लड़कों की ही थी।

अचानक ही बस की रेलिंग पर कसे हुए अपने हाथ के ऊपर किसी दूसरे हाथ का स्पर्श पा मैंने देखा , तो उन्हीं प्रौढ़ सज्जन का हाथ था। वे पीछे खड़े किसी व्यक्ति से बातें कर रहे थे। उनका सर पीछे की ओर घूमा हुआ था। अनजाने में ही उनका हाथ आ गया होगा ऐसा सोचकर मैंने अहिस्ता से अपने हाथ को ज़रा आगे खिसका लिया था। लेकिन दो मिनट बाद ही उसी हाथ का स्पर्श मैंने फिर महसूस किया। पलट करब देखा ,तो वे सज्जन पूर्ववत बातें करने में मशगूल थे। हाथ हटाना चाहा तो उनके हाथ की पकड मजबूत हो गई, मेरे हाथ पर। घबरा के फिर उनकी ओर देखा तो उन्हें अपनी ओर घूरता पाया। एक जोरदार झटके के साथ मैंने अपना हाथ रेलिंग पर से हटा लिया, ये जानते हुए की हाथ हटाने से मैं ख़ुद असंतुलित हो जाउंगी। मैं उन तथाकथित 'सज्जन ' से कुछ भी कह कर बस में ख़ुद आकर्षण का केन्द्र नहीं बनना चाहती थी।
लड़कियों की यही तो त्रासदी है की लोग उन्हीं से छेड़खानी करते हैं और फिर यदि इसे वे ज़ाहिर करती हैं तो लोग उन्हें ऐसी नज़रों से देखते हैं, जिन्हें झेल पाना बड़ा मुश्किल होता है।

लेकिन इस व्यक्ति की हरकत पर मैं अचम्भित थी। कम से कम पचास वर्ष की उम्र तो होगी ही उनकी। फिर क्या किशोरवय के लिए की गई मेरी विवेचना ग़लत हो गई? किशोर होते लड़कों को तो उनका अपनी उम्र से होता नया-नया परिचय उद्दंड बना देता है, लेकिन इनके लिए क्या कहूं? ये तो वृद्धावस्था की ओर अग्रसर हैं!इस प्रकार क्या ये कभी अपनी मेरी ही उम्र की बेटी को कहीं अकेली भेज पायेंगे? क्या ये अपनी उम्र के लोगों पर विश्वास कर पायेंगे? ऐसे 'सज्जनों' की हमारे यहाँ कमी नहीं है , जो लड़कियों के आत्मबल का शमन करते हैं।

मैं अपने कॉलेज की अनुशासन-प्रिय व्याख्याता,बस की भीड़ में इतनी निरीह, दब्बू हो जाती हूँ कि बस के बाहर आकर समझ ही नहीं पाती की मैं इस तरह दोहरा व्यक्तित्व कैसे वहन करती हूँ। शायद उम्र पाने के बाद अपनी इस असहायावस्था से मुक्त हो सकूं।

उन 'सज्जन 'की हरकतों में कमी नही आई थी। वे निरंतर अपने कंधे का स्पर्श मेरे कंधे को दे रहे थे । और उन्हें एक झन्नाटेदार थप्पड मारने की मेरी इच्छा भी बलवती हो उठी थी। बस में भीड इतनी थी कि आगे भी नहीं जा सकती थी। तभी ज़रा आगे एक सीट खाली हुई, और वहां बैठी महिला ने मुझे बुला लिया। शुक्र है भगवान का, वरना थोडी ही देर में मै उस व्यक्ति को एक थप्पड रसीद कर ही देती। मेरा स्टॉप आ गया था। बड़ी राहत महसूस की थी मैंने।

बस के रुकते ही मैं अपने बैग को सम्हालती दरवाज़े की ओर बढी थी । आगे बैठे लडकों की नज़रें मैं अपने चेहरे पर स्पष्ट महसूस कर रहे थी. सिर नीचा किये मैं तेज़ी से नीचे उतर गई. दो कदम आगे बढने पर ही मुझे सुनाई दिया, कोई गा रहा था-
" उमर है सतरह साल इतनी लम्बी चोटी है...."
और मुझे खयाल आया कि आज देर हो जाने की वजह से मैने अपने लम्बे बालों की चोटी को नीचे से खुला ही छोड दिया था. मेरे हाथ यन्त्रवत चोटी लपेटने को उठे लेकिन नहीं अब और नहीं.... अब इस समय मैने उसे यों ही लहराने दिया, उद्दंड हवा के विरोध में.

रविवार, 4 अप्रैल 2010

मेरी पसंद....







हर सुबह को कोई दोपहर चाहिए,
मैं परिंदा हूं उड़ने को पर चाहिए।



मैंने मांगी दुआएँ, दुआएँ मिलीं
उन दुआओं का मुझपे असर चाहिए।



जिसमें रहकर सुकूं से गुजारा करूँ
मुझको अहसास का ऐसा घर चाहिए।



जिंदगी चाहिए मुझको मानी भरी,
चाहे कितनी भी हो मुख्तसर, चाहिए।



लाख उसको अमल में न लाऊँ कभी,
शानोशौकत का सामाँ मगर चाहिए।



जब मुसीबत पड़े, और भारी पड़े,
तो कहीं एक तो चश्मेतर चाहिए।



० कन्हैयालाल नंदन