शनिवार, 28 नवंबर 2009

दस्तक के बाद

साड़ियाँ
सारा कमरा बनारसी साड़ियों, सूट के कपड़ों, बच्चों के कपड़ों, शाल, स्वेटर और जेवरों से अटा पड़ा था.
बहुत प्यारी-प्यारी साड़ियाँ थी नीले रंग की कांजीवरम साड़ी तो बहुत ही प्यारी थी. मनीष, निशि , रीना और सीमा इन चारों के ऊपर कपड़े खरीदने की ज़िम्मेदारी थी, जिसे इन लोगों ने बखूबी निभाया था.
' मम्मी- चलो सबको कपड़े दिखा दूं , और बाँट दूं '
यह जानने के लिए तो सभी उत्सुक थे, की कौन से कपड़े किसके हिस्से में आने वाले हैं. सो एक आवाज़ में ही सारे लोग कमरे में जमा हो गए थे.
"ऐ सीमा , ये नीले रंग की साड़ी तो बहुत प्यारी है, मैं तो यही लूंगी. मम्मी देखो ये पांच बनारसी और दो कांजीवरम साड़ियाँ शुची के लिए थी हैं न?"
"बहुत बढियां हैं. सुनील ने ही पसंद की है न ? बस शुची को भी पसंद आएगी."
" ये दो साड़ियाँ निशि के लिए और ये एक साड़ी और दो सूट के कपड़े रीना के लिए ये दो साड़ियाँ सीमा के लिए..............................
"ये कपड़े मेरे, ये सुनील के, ये के बच्चों के ..........."
साड़ियाँ तो सारी बँट गई मेरे लिए तो कोई साड़ी निकली ही नहीं. भूल गया है क्या मनीष? अरे हाँ अभी वो प्याजी रंग की साड़ी तो रखी है शायद वही मेरे लिए लाये होंगे ये लोग.
" मम्मी ये साड़ी तुम्हारी- रंग अच्छा है न , तुम्हारे लिहाज से तो ठीक ही है "
मनीष एक एकदम हलके क्रीम कलर की सिल्क की साड़ी मेरी तरफ बढ़ा रहा था और मैं? मैं न उसे ले पा रही थी और ना ही कुछ कह पा रही थी . मैं क्या इतनी बूढी हो गयी हूँ? क्या मैं अब कामदार साड़ियाँ पहनने के लायक नहीं रह गयी हूँ ? इन लोगों ने यह कैसे मान लिया की मेरी इच्छाएं मर गयी हैं जो कुछ ये पहना देंगे मैं पहन लूंगी? सीमा, निरीह भाव से मुझे देखने लगी थी.
" ये एक कांजीवरम साड़ी बच रही है.........
" अरे वाह ! बच रही है तो क्यों न मैं ही लेलूँ"
' निशि मैं सोच रही थी कि ये साड़ी भाभी के लिए ठीक रहेगी"
" मम्मी के लिए? अरे अब इस उम्र में मम्मी इसे क्या पहनेंगी? है न मम्मी?"
" हाँ तुम्ही ले लो."
कह दिया था मैंने लेकिन मन बेहद दुखी हो गया था . उम्र के साथ-साथ इच्छाएं भी मर जाती हैं ; ऐसा हमारे युवा होते बेटे, बेटियाँ, बहुएं क्यों सोचने लगते हैं? फिर मैं अभी पचपन की ही तो हूँ. फिर मुझे अच्छे अच्छे कपड़े, साड़ियाँ पहनने का शौक भी बहुत है. अनावश्यक श्रृंगार तो मुझे वैसे ही पसंद नहीं है. पैंतीस वर्ष बीत चुके हैं हम लोगों के वैवाहिक जीवन को . मैं बीस की थी जब हमारी शादी हुई थी एक बेहद सौम्य , सरल और आकर्षक व्यक्तित्व के धनी अनिल मुझे मिले थे. बेहद प्यार करने वाले . मैं खूब सज-संवर के रहूँ, अनिल की यही इच्छा रहती थी. अब तो अनिल भी बेहद चुप-चुप से हो गए हैं. घर में जो कुछ हो रहा है उसे बस निर्लिप्त भाव से देखते रहते हैं.
मन कैसा अजीब सा हो गया था. अपने भीतर आंसुओं का सैलाब सा उमड़ता महसूस किया था मैंने. धत! कैसी पगली हूँ मैं! ठीक ही तो कहते हैं लड़के. भला अब इस उम्र में मैं कामदार साड़ियां पहनूंगी? सांत्वना दी थी मन को. अब जिनके साथ रहना है, उस नई पीढ़ी के साथ एडजस्ट करके ही चलना होगा, वर्ना उनका क्या है, मैं ही आंसू बहाती , मानसिक व्यथा लिए रहूंगी.
शाम को अनिल ने ऑफिस से लौटते ही मुझे आवाज़ दी थी.
"तुम्हारे लिए साड़ी लाया हूँ. वैसे मनीष तो ले ही आया होगा लेकिन ये मेरी तरफ से. शादी वाले दिन यही पहनोगी तुम."
बेहद प्यारी गुलाबी रंग की ज़री के काम वाली सिल्क साड़ी थी.
" लेकिन अब इस उम्र में ये साड़ी पहनते अच्छी लगूंगी क्या?"
"क्यों? इस उम्र से तुम्हारा क्या मतलब है? तुम बूढी हो गई हो क्या? अरे तुम तो अपनी बहू से कहीं ज्यादा अच्छी लगती हो, अभी भी."
और दिन भर के जमा हुए आंसूं सारे बाँध तोड़ के बह निकले थे. अनिल की साड़ी को आँखों से लगा, फूट-फूट के रो पड़ी थी मैं. और अनिल पूरे वाकये से अनजान, परेशान , मेरे रोने से हतवाक खड़े थे. उनकी समझ में नहीं आ रहा था की अचानक मुझे क्या हुआ? लेकिन मैं जानती थी की अब इस साड़ी को लेकर मेरा और अनिल का अच्छा ख़ासा मज़ाक बनाया जाएगा. " बुढापे का प्रेम" कह कर खिल्ली उड़ाई जायेगी. खुद हमारे बच्चे ही हमारा मज़ाक उड़ायेंगे.
जब तक ये तीनों होस्टल में रह कर पढ़ रहे थे, तब तक हम लोगों को अपनी उम्र का अहसास ही नहीं था. लेकिन अब कदम-कदम पर हमें उम्र का अहसास कराया जाता है.
घडी ने चार बजने का संकेत दिया था. अरे!! तो क्या सारी रात मैंने जागते हुए ही गुज़ार दी? मैं अपने प्रति ही ग्लानि से भर उठी थी. सच तो है. बुढ़ापा तो आ ही गया है मेरा. मैं महसूस नहीं कर पाती लेकिन देखने वाले तो महसूस करते हैं न. बच्चे मेरी उम्र के हिसाब से काम करते हैं तो इसमें गलत क्या है? आखिर मैं अपनी उम्र को स्वीकार क्यों नहीं कर पाती? और सचमुच मन को बड़ी शान्ति मिली थी इस विचार मात्र से.
" मम्मी, कितनी देर से जगा रही हूँ. आठ बज रहे हैं. तुम्हारे बिना तो कुछ होने का नहीं. उठो न जल्दी."
रीना जगा रही थी. चाय पर सब मेरा ही इंतज़ार कर रहे थे. लेकिन सब मेरी और ऐसे क्यों देख रहे हैं? आज आठ बजे तक सोती रही तो जैसे कोई अनहोनी हो गई! सब तो रोज़ ही आठ बजे तक सोते हैं. मन फिर उदास हो गया था. आखिर ये सब मुझे समझते क्या हैं? इन सब के लिए मेरी हैसियत क्या है?
घर में शादी का माहौल था. वातावरण में खिलखिलाहटें और कहकहे घुले-मिले रहते थे. लेकिन मेरा मन खिन्नता से भरा रहता था. सबसे झल्ला के बोलती थी. हमेशा बडबडाती रहती थी. और शायद इन सभी के हंसी-ठहाकों के बीच मैं ही तनाव पैदा करती थी.
कल बारात जाने वाली थी. घर में बड़ा अच्छा लग रहा था. सुनील भी हल्दी लगाए पूरे घर में घूम रहा था. बहुत खुश था लड़का. आखिर शुचि से किया हुआ वायदा जो पूरा हो रहा था उसका. मैं भी खुश थी क्योंकि मैंने तय कर लिया था की मैं अनिल की लाई कामदार साड़ी ही पहनूंगी. चाहे कोई कुछ भी कहे.
बड़े जतन से अपने बालों में छिटकी चांदी को डाई करके काले बालों में मिलाया. चेहरे को मलाई से चमकाया. बारात उसी शहर में जानी थी सो सारे काम इत्मीनान से निपटा रही थी. ज़री से जगमग होती साड़ी पहनी. उसके साथ मैच करते आभूषण भी पहने. और अब बेहद खुश थी की मैं निशि से ज्यादा अच्छी लग रही हूँ. अनिल ने मुझे देखा, बोले कुछ नहीं( लो भला!! तारीफ़ तक नहीं कर सकते?) बच्चों ने भी कुछ नहीं कहा. न कहें. जलते हैं मुझसे. घर के अन्य मेहमान तो तारीफों का पुलिंदा बाँध रहे हैं न? यही काफी है. अपनी सज्जा के बल पर लगभग पांच वर्ष छुपा लिए थे मैंने अपनी उम्र के . और अब अपनी भावी समधिन , जिनकी सुन्दरता के बहुत कशीदे सुनील काढता रहता है, का मुकाबला करने को तैयार थी.
बारात
बारात शुचि के दरवाजे पर पहुँच गई थी. मेरी नज़रें बस शुचि की माँ को ही तलाश कर रही थीं. जो भी गहनों, जडाऊ साड़ी से लकदक महिला दिखती , तो मैं सोचती की यही है क्या शुचि की माँ?
" हम सब की और से ढेरों ढेर बधाईयाँ, शुभकामनाएं स्वीकार कीजिये."
इस आवाज़ ने तन्द्रा भंग की थी मेरी.
अरे!!! यही है क्या शुचि की माँ? सिल्क की क्रीम, लाल बोर्डर की साड़ी पहने, माथे पर सिन्दूर की लाल बड़ी सी बिंदी लगाये, बालों को एक ढीले से जूड़े के रूप में लपेटे, सर पर पल्लू लिए हुए मेरे सामने एक बेहद सौम्य महिला खड़ी थी. मेरे दोनों हाथ अपने आप अभिवादन में जुड़ गए. उनहोंने बड़े प्यार से मेरे हाथों को थाम लिया था, और भीतर ले चलीं थीं.
उस सादगी भरे व्यक्तित्व में कैसा गज़ब का आकर्षण था! वहां ढेरों जडाऊ साड़ियों के बीच उनका सादा वस्त्रों में लिपटा मोहक व्यक्तित्व अलग ही दिपदिप कर रहा था. मेरे मुंह से शर्म के मारे शब्द ही नहीं निकल रहे थे. वे भी तो मेरी ही उम्र की हैं, लेकिन कितनी सरल, सौम्य और सादगी से भरपूर. एक मैं हूँ, जो अपनी उम्र को ताक पे रख के गहनों, साड़ियों के पीछे दौडती फिरती हूँ.
मेरे गहने मुझे काटने लगे थे. मेरी भारी साड़ी जो अभी तक अपने रेशमी अहसास से मुझे आनंदित कर रही थी, अब चुभने लगी थी. मुझे लग रहा था की मेरे सफ़ेद बाल जिन्हें मैंने बड़े जतन से काला किया है, अपनी पूर्णता के साथ झलकने लगें. मैं वही मनीष की लाई साड़ी पहन लूं.
सचमुच बच्चे सही मूल्यांकन करते हैं हमारा, हमारी उम्र का और उसके हिसाब से होने वाले प्रत्येक कार्य का. आज मुझे अपनी उम्र का भरपूर अहसास हुआ था. मैं खुद उसे महसूस करना चाहती थी आज, अभी, इसी वक्त.
मुझे लगा था की बुढ़ापा दस्तक देने लगा है. नहीं..........दस्तक देने के बाद आधा सफ़र भी तय कर चुका है..

36 टिप्‍पणियां:

  1. vandana ji,
    bilkul naari-katha; kintu kai bhavnaatmak kono ka sparsh karti hui; aur udwelit karti hui bhi ! ram na kare katha-naayika kabhi budhi ho ! aameen !!
    mera blog to hindi likhna hi bhool gaya ! isiliye english me...
    anand v. ojha.

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  2. बहुत सुंदर और अच्छी लगी यह आपकी कहानी.... जीवन्तता और भावनात्मक रूप से दिल को छू गई....

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  3. अच्छी कहानी है -सादगी हर उम्र के लिए ठीक है क्या यौवन क्या ज़रा !

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  4. बहुत ही सुंदर कहानी ..आपकी पहले की कहानियों की तरह ....मुझे लगता है कि आपको प्रकाशन के लिए इन्हें प्रेषित करना चाहिये ..मेरा संपर्क नं है आपके पास मेल भी है ..।

    आज बहुत दिनों बाद समय पर पहुंच गया पढने और टीपने के लिए..॥

    अजय कुमार झा

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  5. बहुत सुन्दर सहज प्रवाहमयी बहुदा स्त्रियों के स्वभाव की जीती जागती तस्वीर । धनयवाद

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  6. bahut sundar kahani hai aur saath me tasvir bhi ,sundarta aur saadgi liye huye is rachna ki baat hi kuchh nirali hai ,aksar ki tarah dil ko sparsh karti hui .

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  7. बहुत सुंदर तरीके से आपने इस कहानी में नारी के जज्बातों को प्रस्तुत किया

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  8. बहुत ही अच्छी कहानी है,मन के द्वंद्व को उजागर करती हुई...

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  9. नारी मन के द्वंद्व को बड़ी सहजता और कुशलता से चित्रित किया है आपने । बहुत हृदयस्पर्शी कहानी है ।
    बधाई स्वीकार कीजिये ।

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  10. आपने बहुत सही कहा है कि
    बच्चे हमारी उम्र के अनुसार परिधान का सही मूल्यांकन करते हैं।
    बहुत सुन्दर शिक्षाप्रद लघुकथा!
    बधाई!

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  11. प्रवाहयुक्त सुन्दर कहानी..बधाई.

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  12. कहानी के माध्यम से भारतीय समाज में औरत की स्थिति बयान सुन्दर तरीके से बयान की। हरेक की अपनी अपनी नजर है। मुझे लगता है कि कहानी एक ऐसी महिला की स्थिति मानसिक स्थिति बयान करती है जो पति पर निर्भर है। पति उसे चटक-मटक कपड़े,जेवर पहने हुये देखना चाहता है। हाल के दिनों में पति कुछ चुप से रहने लगे हैं। इससे महिला का आत्मविश्वास हिल गया है। फ़िर जब नयी साड़ी आती है तब भी उसके मन में आत्मविश्वास नहीं आता और वह उसी नजरिये से अपनी समधन को देखती है। आत्मविश्वास की यही कमी उसको यह सोचने को बाध्य करती है कि उसने नयी भारी साड़ी पहनकर जैसे कोई गुनाह किया है और उसे बुजुर्गों की तरह ही रहना चाहिये।

    समाज ने सालों साल अपने पैमाने बना रखे हैं। उन खांचों से बाहर कोई जाता है तो खटकता है। महिला की उमर ५५ साल की हो गयी तो क्या उसकी उमंगे भी मर गयी होंगी। न भाई!

    मामला कहानी का है वो आपने खतम कर दी वर्ना नायिका मुझसे मिलती तो हम उसको ये वाली शेर सुनाते : जवानी ढ्ल चुकी खलिशे मोहब्बत आज भी लेकिन/वहीं महसूस होती है जहां महसूस होती थी
    इसके बाद समझाते आपका नये चटक और भारी कपड़ों के प्रति ललक आपकी उमंगों की परिचायक हैं। बूढ़ा महसूस करें आपके दुश्मन।

    आनन्द वर्धन ओझा जी की टिप्पणी से सहमति--राम न करे कथानायिका कभी बूढ़ी हो।

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  13. ० श्रद्धेय,बहुत-बहुत आभार.
    ० धन्यवाद महफ़ूज़ जी.
    ० सच है अरविन्द जी, सादगी हमेशा ही अच्च्ही लगती है.
    ० झा जी, कहानियां ज़रूर प्रेषित करूंगी.
    ० निर्मला जी, आपका आशीर्वाद इसी प्रकार मिलता रहे, ऐसी इच्छा है मेरी.
    ० धन्यवाद ज्योति जी.
    ० अच्छा लगा अजय जी, आज आप अपने नाम सहित आये हैं.
    ० धन्यवाद रश्मि जी.
    ० धन्यवाद श्रीश जी.
    ० धन्यवाद साधना जी.
    ० पहले मां-बाप बच्चे को सिखाते हैं, फिर बच्चे मां बाप को सिखाने लगते हैं. शायद यही सबका सच है. बह्त-बहुत धन्यवाद शास्त्री जी.
    ० धन्यवाद समीर जी.
    ० क्या बात है अनूप जी. आज फ़ुरसत से कहानी पढी आपने शायद. निश्चित रूप से ये आत्मविश्वास की ही कमी है, जो एक आम घरेलू महिला में हमेशा रहती है. कथा नायिका को अब और बूढा नहीं होने दूंगी.हा.हा.

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  14. bahut bahut achchhi lagi kahani ,tum to is vidha men parangat ho gayi ho,bhaavnaon ko itni sahajta se kaghaz par utarti ho ki apne aap hi wah kahe bina raha nahin jata.badhai ki patra ho tum.

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  15. बुढापा नाम है जिसका वो अ
    फसुर्दगी दिल की
    जवानी कहते हैं जिसको तबियत की जवानी है

    बढिया है कहानी

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  16. ० इस्मत इतनी तारीफ़ मत करो, कि मैन चने के झाड पर ही चढ जाऊं..
    ० अच्छा शे’र है. धन्यवाद

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  17. सादगी की बात करती कहानी ही नहीं वरन शिल्प और कथ्य भी. जो आपने बुना वह किसी भी परिवार के आँगन में सहजता से मिल जाता है सुख दुःख में. बहुत सुंदर, बहुत पसंद आई. वैसे पारिवारिक कहानियों में रिश्तों और अनुभूतियों को बुनने में आप सिद्धस्त हैं.

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  18. शुरू में कहानी पढ़ते पढ़ते ऐसा लगा मानो मेरे मन कि बात ही कह दी हो ,और सारे अपने दुश्मन लगने लगे किन्तु कहानी के महत्वपूर्ण मोड़ पर सचमुच जैसे असमान से ही गिर गई |बहुत ही सूक्ष्मता से नारी के मन के भावो को दर्शाती सुंदर कहानी |एक महिला बढती उम्र के साथ अपने आप को काफी असुरक्षित और उपेक्षित समझने लगती है कितु अगर हमउम्र के साथी मिल जाते है तो वो सहजता के साथ बदलती हुई परिस्थियों के साथ तारतम्य बैठा लेती है और यही बात नारी को गरिमामय बना देती है |
    बहुत अच्छी लगी यह रचना |
    बधाई

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  19. वंदना जी पहले तो मैं आपका तहे दिल से शुक्रियादा करना चाहती हूँ आपकी प्यार भरी टिप्पणियों के लिए जिससे मुझे लिखने में और उत्साह मिलता है! काफी दिनों बाद आपका शानदार पोस्ट पढ़कर बहुत अच्छा लगा! अत्यन्त सुंदर कहानी लिखा है आपने! औरत के जज्बादों को आपने बखूबी शब्दों में पिरोया है! इस लाजवाब पोस्ट के लिए बधाई!

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  20. बहुत सुन्दर लघुकथा.....
    बधाई!

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  21. ० धन्यवाद किशोर जी.
    ० धन्यवाद शोभना जी.
    ० धन्यवाद बबली जी.
    ० धन्यवाद मार्क जी.

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  22. Vandanaji,
    Kahanee ne shuruse aakhirtak baandhe rakha..! Saral, razmarra ka jeevan kram, lekin harek shabd ne baandhe rakha...itna zaroor kahungee ki, haathkarghepe bane wastron ke rang hindustanee aurton pe hamesha achhe lagte hain..gavon me dekhti hun...aurte chatakh rang pahantee hain...gar wo synthetic hota hai,to bhadda lagta hai...haath kargheke rang janchte hain...!
    Ek saans me bada kam padh patee hun...

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  23. रचना गहरा प्रभाव छोडऩे में समर्थ हैं ।

    मैने अपने ब्लाग पर एक कविता लिखी है-रूप जगाए इच्छाएं । समय हो तो पढ़ें और कमेंट भी दें-
    http://drashokpriyaranjan.blogspot.com

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  24. १.उम्र और इच्छाओं के द्वंद्व को खूब उभारा है. बधाई.
    २.'ऋषभउवाच' तक आने का शुक्रिया.

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  25. बहुत बढ़िया लगी आपकी यह कहानी दिल के अन्दर के भावों को खूब अच्छे से उकेरा है आपने शुक्रिया

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  26. वंदना जी कमाल का लिखतीं हैं .....स्त्री मन की इतनी बारीक़ पकड़ ....शायद अक्सर ऐसा होता होगा स्त्रियों के साथ ....गहने तो मुझे भी पसंद नहीं ....पर आपने जिस करीने से सजाकर शब्दों को पेश किया तारीफ के काबिल है ......अब पता चला शेर को क्यूँ नहीं छोड़ रहीं थी .....!!

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  27. बहुत ही सुंदर कहानी, मन को छू जाने वाली।
    कहानी का अंत बहुत ही सार्थक है। बधाई स्वीकारें।

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    सांसद/विधायक की बात की तनख्वाह लेते हैं?
    अंधविश्वास से जूझे बिना नारीवाद कैसे सफल होगा ?

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  28. बहुत सार्थक और सच्ची कथा, मेरे घर में जब तब घटती है, पर यहाँ उल्टा है बच्चे कहते हैं की पहले की तरह ही रहा करो, आपकी कहानी के हर मोड़ पर अपने आप को खड़ा पाया
    अच्छा लगा ये सोच कर की चलो कोई तो है जो मेरी तरह sochta है सादर रचना

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  29. मानव मनोविज्ञान का इतना बढ़िया चित्रण अभिभूत कर गया. आप तो जैसे लोगों के मन मस्तिष्क में झाँक लेती हैं. यही सच है की उम्रदराज़ लोगों को समाज अपने चश्मे से देखता है, उन्हें अपनी पसंद के कपड़े पहनाना चाहता है और उनकी पसंद-इच्छा की ओर कोई ध्यान नहीं देता. आप बधाई की पात्र हैं कि कथा के प्रथम भाग में आपने इस मनः स्थिति को उकेरने में अपनी तरफ से कोई कोर-कसर बाकी नहीं रखी है.
    लेकिन मैं अंत से संतुष्ट नहीं हुआ. आप घूम फिर कर वहीं आ गईं कि उम्रदराज़ लोगों को सादे, हल्के रंगों वाले, दूसरों की पसंद के ही पहनावे पहनने चाहियें. कथा के मूल पात्र का सहसा रुधिर परिवर्तन मुझे, केवल मुझे रास नहीं आया.
    मुझे पता है, अधिकाँश लोग मेरी राय से सहमत नहीं होंगे, वे वही कहेंगे जो आपने बुना है. परन्तु मैं कथानक के इतने उम्दा आगाज़ के बाद इस तरह के समझौते से हतप्रभ रह गया. मैं कथा की आलोचना नहीं कर रहा. कथा का अंत सुखांत होने के बावजूद यह सवाल छोड़ जाता है कि क्या उम्र की यही नियति है.
    वन्दना जी, आप से मेरी अपेक्षाएं शायद कुछ ज्यादा लिबरल होना मांग रही हों, इसके लिए मैं क्षमा प्रार्थी हूँ. लेकिन सीमायें तोड़ने वाले ही इतिहास रचते हैं या पहचान बनाते है. मैं भी अगर गजलों के परम्परागत स्वरूप को बरकरार रखते हुए चलता तो क्या वन्दना दुबे अवस्थी की नजर इन रचनाओं पर टिकती?

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  30. आपकी काहानी वाकई दिल छू लेने वाली है ...शरीर कितना भी पुराना क्यों न हो जाये पर मन हमेशा जवान होता है..पर आपकी कथा नायिका अगर अभी भी उस जिन्दादिली को बरकार रखती है तो क्या बुरा है..खैर कहानी तो कहानी ..

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  31. aap kikhani khani hai us men rvani hai smya dstk hai jindgi bemani nhiek khani hai
    dr.vedvyathit@gmail.com

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  32. बहुत खूबसूरती से ऐसी नारी के मन के अनातार्द्वंद को चित्रित किया है जिसकी उम्र बढ़ रही है....पर मन अभी भी पीछे भाग रहा है.....उम्र के दोनों ही पक्ष का सुन्दर विवेचन किया है...कहानी बहुत अच्छी लगी...बधाई

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  33. सरल भाषा में लिखी आप की कहानी'दस्तक के बाद' पढ़ी। आप ने जीवन की वास्तविकता को सब के सामने उजागर किया है।निःसन्देह! हर वेश-भूषा आयु के अनुसार ही शोभा देती है।

    मेरे ब्लोगUnwarat .com में लिखे लेख वा कहानियाँ पढ़ कर अपने वि्चार अवश्य व्यक्त कीजियेगा।

    सधन्यवाद,

    विन्नी

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