मंगलवार, ७ जुलाई २००९

विलोम

मुट्ठी भर दिन
चुटकी भर रातें,
गगन सी चिंताएँ,
किसको बताएं?
जागती सी रातें,
दिन हुए उनींदे,
समय का विलोम
कैसे सुलझाएं?
भागती सी सड़कें,
खाली नहीं आसमान,
दो घड़ी का सन्नाटा ,
हम कहाँ से पायें?

54 टिप्पणियाँ:

ओम आर्य July 7, 2009 1:19 AM  

भागती सी सड़कें,
खाली नहीं आसमान,
दो घड़ी का सन्नाटा ,
हम कहाँ से पायें?

बहुत ही सही कही है आपने .........समसाम्यिक भी है .........कई और शेडस निकल रहे है आपकी रचना से .........बहुत ही सुन्दर बधाई

विनोद कुमार पांडेय July 7, 2009 1:23 AM  

atynt bhavpurn rachana..

dil se padhane yogy..

bahut bahut badhayi...

Arkjesh July 7, 2009 1:24 AM  

खुद के भीतर जायें और सन्नाटा पायें, वहां किसी की पहुंच नहीं है । बहुत बढिया अभिव्यक्ति है । संक्षिप्त और सुन्दर ।

‘नज़र’ July 7, 2009 1:38 AM  

बहुत ही अच्छी रचना है

---
चाँद, बादल और शाम

aleem azmi July 7, 2009 2:49 AM  

behtareen kavita aapne......likha

अल्पना वर्मा July 7, 2009 3:10 AM  

'समय का विलोम
कैसे सुलझाएं? '
बहुत खूब!
सरल शब्दों में भावों की अभिव्यक्ति में सफल बहुत ही अच्छी कविता है वंदना जी..

monali July 7, 2009 3:57 AM  

Sach me vartmaan jeevan ka sahi khaaka kheec rahi hai aapki yeh rachna...

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक July 7, 2009 4:20 AM  

वन्दना जी!
सुन्दर अभिव्यक्ति है।
"सतसैय्या के दोहरे,ज्यों नाविक के तीर।
देखन छोटे लगें, घाव करें गम्भीर।।"

वन्दना अवस्थी दुबे July 7, 2009 4:49 AM  

ओम जी,विनोद जी,अर्कजेश जी,नज़र जी,अलीम जी,अल्पना जी, मोनाली जी और शास्त्री जी आप सब की तहे दिल से आभारी हूं.

Udan Tashtari July 7, 2009 5:28 AM  

समय का विलोम
कैसे सुलझाएं?

-क्या बात है! बेहतरीन!

ARUNA July 7, 2009 8:23 AM  

वाह वंदना जी क्या बात है! बहुत बढ़िया!
मीठी रचना कहूं या सुन्दर.......कुछ भी हो, बेहद पसंद आया मुझे!

वन्दना अवस्थी दुबे July 7, 2009 10:15 AM  

बहुत दिनों बाद आये हैं,समीर जी आप...याद रखियेगा.

वन्दना अवस्थी दुबे July 7, 2009 10:17 AM  

अरुणा जी ,आपकी टिप्पणी भी बहुत मीठी है...बस इसी तरह मिठास घोलती रहें हमारे रिश्ते में भी..

शरद कोकास July 7, 2009 11:49 AM  

मुझे वह गीत याद आया ..दिन खाली खाली बर्तन है और रात है एक अन्धा कुआँ .देखिये इस तरह की निराशा वादी कवितायें लिखने का अब समय नहीं है उठिये और अपने भीतर आशा का संचार कीजिये .इसके लिये क्या करना होगा ..यह ब्रेक के बाद

AlbelaKhatri.com July 7, 2009 6:57 PM  

marm chhoone wali

komalkant kavita.....

atyant uttam kavita...

____badhaai !

वन्दना अवस्थी दुबे July 7, 2009 10:21 PM  

ज़रूर शरद जी. मुझे ब्रेक खत्म होने का इन्तज़ार रहेगा.

वन्दना अवस्थी दुबे July 7, 2009 10:22 PM  

धन्यवाद अलबेला जी. बस ऐसे ही आते रहिये..

ज्योति सिंह July 8, 2009 6:14 AM  

bahut hi sundar .saath me ek yaad bhi taaza hui .

Kishore Choudhary July 8, 2009 10:31 PM  

आपकी ख़ास शैली में ख़ास भावों से सजी कविता सुन्दर है , अति सुन्दर !

Science Bloggers Association July 9, 2009 4:31 AM  

अरे वाह, बढी गजब की रचना है ये तो। कम शब्दों में ऐसी अदभुत रचना पहले नहीं देखी।
-Zakir Ali ‘Rajnish’
{ Secretary-TSALIIM & SBAI }

वन्दना अवस्थी दुबे July 9, 2009 5:34 AM  

@धन्यवाद ज्योति जी. हमारी-आपकी यादें साझा जो हैं.
@धन्यवाद दूं क्या किशोर जी??
@ज़ाकिर जी अतिशय तारीफ़ के लिये शुक्रिया...ये आपका बडप्पन है.

आनन्द वर्धन ओझा July 9, 2009 8:32 PM  

कम शब्दों में कई रंग परोसे हैं आपने. एक पूरा आसमान भी सुकून नहीं देता तो कहाँ भटके बेसहारा मन ! ऋतज जैसी छोटी और प्यारी-सी कविता के लिए आपको साधुवाद दे देना कम लगता है वंदनाजी !

वन्दना अवस्थी दुबे July 10, 2009 3:59 AM  

आनंद जी( सप्रयास सम्बोधन लिखने में भी तकलीफ़देह ही है) लगता है, अपनी ही कविता एक बार फिर पढनी होगी...क्या लिखा है मैने??

''ANYONAASTI '' {अन्योनास्ति} July 10, 2009 10:15 AM  

वंदना जी ,
आपका ईमेल मिला उससे पहले कबीरा पर अनुसरण में देख चुका था , पसंद करने और प्रशंसा करने आदि सभी का धन्यवाद ,आभारी हूँ ||
मैंने भी आप जैसी समस्या कहीं कंही पाई थी ,लीजिये आप की समस्या का हल कर दिया क्यों की ज्योति जी तथा कई अन्यो ने भी यही शिकायत की थी |
आप से अनुरोध है की '' पिटारा टूल हिंदी ब्राउज़र ''डाउन -लोड कर लें उसमें कई अनोखी सुविधाएँ हैं | मैं यह टिप्पणी सीधे आप के टिप्पणी बॉक्स में ही टाइप कर रह हूँ | जहाँ यह सुविधा काम न करेगी वहां के लिए टूल में गूगल इंडिक में टाइप कर कॉपी-पेस्ट कर सकतें हैं ; हाँ इस गूगल इंडिक से कॉपी के लिए ctrl+c का और इस में पेस्ट के लिए ctrl+v का प्रयोग करना पड़ेगा | इस प्रकार कॉपी करते समय जरा अतिरिक्त सावधानी रखनी पड़ेगी वरना सारे किये धरे पर सफाटा फिर जायगा जैसा अभी मेरे साथ हुआ है | हेम पाण्डे जी के ब्लॉग-पोस्ट पर टिप्पणी करते समय ; झल्ला कर इधर चला आया हूँ क्यूँ की लम्बी टिप्पणी करता हूँ इस लिए ज्याद खलता है ; आप भी सोच रही होंगी कैसा इन्सान है जो इतना लम्बा लिख गया और पोस्ट के बारे में कुछ नहीं कहा|
तो :..........

गगन सी चिंताएँ,
किसको बताएं?
जागती सी रातें,
दिन हुए उनींदे,
समय का विलोम
कैसे सुलझाएं?


जो पंक्तियाँ मैंने ऊपर चयनित की हैं , वही मेरी दृष्टि में इस की पञ्च लाइन है , और वही आपकी इस रचना में आप की लेखनी को जीवंत कराती है |

वन्दना अवस्थी दुबे July 10, 2009 10:32 AM  

धन्यवाद ...क्या सम्बोधन दूं नही जानती अगर आपका नाम जान सकूं तो आभारी रहूंगी. तमाम जानकारियों के लिये भी धन्यवाद. वैसे मैं हिन्दी लिखने के लिये बारहा का इस्तेमाल करती हूं.

anil July 10, 2009 1:01 PM  

बहुत खूब बहुत ही सुन्दर रचना आभार !

तीसरी आंख July 11, 2009 6:38 AM  

बहुत बढ़िया रचना बधाई.

Prem Farrukhabadi July 11, 2009 10:50 PM  

Gyan aur darshan se yukt kavita bahut kuchh kah rahi hai.rachna pathneey bhi hai aur mananeey bhi dil se badhai.

वन्दना अवस्थी दुबे July 12, 2009 2:34 AM  

धन्यवाद अनिल जी,तीसरी आंख के सम्पादक जी, और प्रेम जी.

अमिताभ श्रीवास्तव July 12, 2009 6:00 AM  

" ek akela is shahar me..raat me yaa dopahar me....."
aapki rachna ne mujhe barbas hi is geet ki yaad dilaa di, halanki aapki rachna aour is geet me kaafi antar he, kintu yaad ho aayaa to bs ho aaya./// saar kuchh isi tarah ka laga.
------------
bs yahi chahtaa hoo aour sab kuchh dhire dhire haatho se chhotataa jaataa he.../// भागती सी सड़कें,
खाली नहीं आसमान,
दो घड़ी का सन्नाटा ,
हम कहाँ से पायें?
---------

vikram7 July 12, 2009 9:16 AM  

सरल शब्दो मे सुन्दर अभिव्यक्ति,मन को छूती रचना

आशीष खण्डेलवाल (Ashish Khandelwal) July 13, 2009 5:02 AM  

वाह, छोटी-छोटी पंक्तियों में बहुत गहराई.. आभार

वन्दना अवस्थी दुबे July 13, 2009 5:41 AM  

धन्यवाद अमिताभ जी, विक्रम जी.

वन्दना अवस्थी दुबे July 13, 2009 5:42 AM  

अरे वाह आशीष जी, आपने तो सचमुच ही अपना वायदा निभाया है.....ब्लौग पर आने और टिप्पणी करने के लिये साधुवाद.

''ANYONAASTI '' {अन्योनास्ति} July 13, 2009 7:23 AM  

वंदना जी ,
आप के धन्यवाद का आप को धन्यवाद ,यूँही मुलाकातें होती रहीं तो नाम भी पता चल जायेगा , वैसे बकौल सिकंदर मिर्जा उनके ''शेख पियारा'' ने कहा है कि नाम में क्या रखा है [ अंग्रेजों ने यह नाम चुरा कर शेक्सपियर कर दिया है ऐसा वे कहा करते थे ]|मुझे ख्याल आया तो फिर अल ब्रह्मिण का बिगड़ते बिगड़ते अल ब्राह्मिन ====> अल ब्रहामिन ===>इल ब्रहामिन==> इब्राहमिन [मिर्जा साहब अब तक लाहौल बुदबुदाना शुरू कर चुके थे ] ===> इब्राहीम होगया होना भी सही हो सकता है ? मिर्जा ने जोर जोर से मेरे नाम कि लाहौल पढ़ते पिक थूकी और गुस्से से बोले इसी लिए तो म्यां तुम्हें शायरी का शहूर नहीं आया ,इसी लिए तुमसे मई कोइ भेद कीबात नहीं बताता न अदब अदाब की बात करता हूँ |
माफ़ कीजियेगा वंदना जी इस वक्त इस बात का कोइ औचित्य नहीं था , पता नहीं कहाँ से दिमाग में आगई और पेट में गैस उठने लगीं ,जुबान खुजलाने लगीं उंगलिया कुलबुलाने लगीं और मैं मज़बूर हो गया कहने को |
पुनः माफ़ कर दीजियेगा

भूतनाथ July 13, 2009 10:39 AM  

बहुत ही अच्छा लगा आपका ब्लॉग.....और अत्यंत ही उम्दा आपकी रचनाएं....सच....!!

वन्दना अवस्थी दुबे July 14, 2009 1:35 AM  

धन्यवाद भूतनाथ जी.

शोभना चौरे July 14, 2009 5:29 AM  

समय का विलोम
कैसे सुलझाएं?
भागती सी सड़कें,
vikas ka muly chukana hoga ,suvidhbhogi yantr yntrna ban rhe hai jeevan ke liye .
ytharth drshati sundr rchna .

Mahesh Sinha July 14, 2009 9:34 AM  

sab bhag rahe hain pata nahi kahan

वन्दना अवस्थी दुबे July 14, 2009 10:18 AM  

धन्यवाद शोभना जी,महेश जी.

Nidhi July 14, 2009 9:33 PM  

bhut hi achha likha hai aapne specially
do ghadi sannata kahan se ppaye hum?

वन्दना अवस्थी दुबे July 15, 2009 12:23 AM  

बहुत-बहुत धन्यवाद निधि जी.

Harkirat Haqeer July 15, 2009 2:35 AM  

मुट्टी भर दिन
चुटकी भर रातें
गगन की चिंताएँ
किसको बताएं

सुंदर और सार्थक रचना .....!!

Harkirat Haqeer July 15, 2009 2:35 AM  

मुट्टी भर दिन
चुटकी भर रातें
गगन की चिंताएँ
किसको बताएं

सुंदर और सार्थक रचना .....!!

सैयद | Syed July 15, 2009 11:41 AM  

बहुत ही सार्थक रचना..

Tigerdiaries July 16, 2009 3:13 AM  

Ishwar kare saraswati aapki kalm par sadaiv vidhmaan rahe.
Satyendra

वन्दना अवस्थी दुबे July 16, 2009 3:34 AM  

अरे वाह सत्येन्द्र जी...आपकी टिप्पणी देख कर कितना अच्छा लग रहा है..

अनूप शुक्ल July 23, 2009 5:26 AM  

सुन्दर, सरल-सहज कविता।

मनोज द्विवेदी July 28, 2009 1:19 AM  

Kuchh Khas nahi laga par jab itane log tarif pe tarif kiye ja rahe hain to main bhi kar hi de raha hun..Vaise badhiya likha hai apne. loktantra hai bahumat ka jamana...

वन्दना अवस्थी दुबे July 28, 2009 3:23 AM  

नहीं मनोज जी, आप आलोचना भी कर सकते हैं.लोकतन्त्र है, इसीलिये तो आप अपनी बात आज़ादी के साथ कह सकते हैं. ज़रूरी नहीं कि बहुमत के साथ ही जाने पर मजबूर हुआ जाये.

Mithilesh dubey July 31, 2009 11:12 AM  

मुट्टी भर दिन
चुटकी भर रातें
गगन की चिंताएँ
किसको बताएं
sundar rachna

shama August 6, 2009 5:18 AM  

Aayi to thee,aapki khoobsoorat tippanee ke liye shikriya kahne..

Lekin ye rachna padhee..sirf itnaahee kah sakti hun,'waah!'
Ab kissa padh ke phir tippanee..Ye to kewal kavy rachnako leke thee...

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