बुधवार, 10 जून 2009

सीमाबद्ध

'अरे...........क्या कर रहे हो?' जब तक मैं कुछ समझूं, तब तक सुनील मुझे एक प्यारी सी साडी में लपेट चुके थे। और मैं भी अवश, मंत्रमुग्ध सी उसमें लिपटती जा रही थी।
'अब कुछ समझ में आया की मैं क्या कर रहा था?'
'आया जनाब , लेकिन अपने स्वेटर पर तो रहम किया होता, सारे फंदे निकल गए...'
आज हमारी शादी की सालगिरह थी। दस साल हो गए, लेकिन सुनील इस दिन को सेलिब्रेट करना नहीं भूलते। जब से मैं इस घर में आई हूँ, तब से सुनील और उनके घर वालों ने मुझे अपने प्यार-स्नेह से सराबोर कर दिया है। कभी-कभी तो इतना अधिक प्यार असह्य हो जाता है, मेरे लिए। इतने प्यार-दुलार की आदि नहीं हूँ न! पाँच बरस की थी जब मेरी माँ का देहांत हुआ । अपनी कर्कशा चाची के पास ही रही। पापा ने मेरे कारण दूसरी शादी नहीं की अपने माँ-पापा की दुलारी इकलौती बेटी जो थी। उन्हें डर था, की दूसरी माँ पता नहीं मुझे प्यार दे पाएगी या नहीं? लेकिन पापा ने जिस डर से शादी नहीं की, उससे मुझे बचा पाये?
मुझे अच्छी तरह याद है, मैं आठ बरस की थी तब। रक्षा बंधन का दिन था। अपनी चचेरी बहनों नीलू-शीलू दी के साथ ही मैंने भी मेंहदी लगाई थी। सुबह सबकी हथेलियाँ मेंहदी से लाल हो रही थीं। दोनों दीदियाँ तो अपने हाथों तक पानी पहुँचने ही नहीं देना चाहती थीं। उनकी देखा-देखी मैंने भी पानी से बचने की सोच ली। अपनी छोटी-छोटी रची हुई हथेलियों को देख कर मैं फूली न समा रही थी। तभी चाची की आवाज़ आई-
'रीतू, चल ये कप धो दे ज़रा। सब को चाय दे दूँ। '
मैंने निरीह भाव से नीलू दीदी को देखा तो 'जा न..कप धो दे ।' कह कर उनहोंने मुझे झिड़क दिया। आंसू आ गए मेरे लेकिन आंसुओं को ज़ज्ब करना तो बहुत बचपन में ही सीख लिया था मैंने। शायद मेरा नन्हा मन समझ गया था की यहाँ मेरे आंसुओं की कोई कीमत नहीं।
नहा-धो कर नीलू-शीलू दी और राजू ने नए कपडे पहने थे और मैंने अपनी पुरानी फ्राक जो पापा दीवाली में लाये थे, अपने नन्हें हाथों से धोकर जिसे मैंने रात में ही तकिये के नीचे रख लिया था, पहन ली। राखी पर मेरे कपडों के लिए पापा ने पैसे भेजे थे मुझे मालूम था, लेकिन उससे क्या? उन पैसों का क्या हुआ मुझे नहीं मालूम जानने लायक उम्र भी नहीं थी। मेरे बड़े होने पर पापा ने बताया था की वे मेरे सभी खर्चों -कपडों के लिए नियमित पैसा भेजते थे, लेकिन मुझे याद नहीं पड़ता की चाची ने मेरे लिए कभी कोई कपडा ख़रीदा हो। जब पापा आते थे तो वही ज़रूरत की तमाम चीज़ें खरीद देते थे। उनमें से भी मुझे क्या मिलता था?
दोनों दीदियाँ घंटों मुझसे झूला झुलावाया करतीं थीं, और मैं भी बस इस इच्छा से की बाद में मुझे भी पाँच चक्कर झूलने को मिलेंगे, खूब तेज़ झूला झुलाती थी। लेकिन वो पांच चक्कर मुझे कभी नहीं मिलते थे। एक बार पापा ने मुझे ले जाने की बात की थी लेकिन तब चाची ने जबरन रोक लिया था, उनकी स्थाई नौकरानी न चली जाए इस डर से। मैं भी चाह कर भी जाने की बात नहीं कह पाई थी। कुछ बोलने का कभी मुझे मौका ही नहीं मिला। और शायद इसीलिये मेरे शब्द मुझसे रूठ गए थे। अब मैं चाह कर भी अपनी बात किसी को समझा ही नहीं पाती।
दिन हो या रात ज़रूरत पड़ने पर मुझे ही बुलाया जाता था। ज़रा सा काम बिगडा नहीं की चाची के ज़ोरदार थप्पड़ चेहरा लाल कर देते थे। अपनी माँ की दुलारी छुईमुई सी मैं, चाची के डर से काम और भी ज़्यादा बिगडते,मार और ज़्यादा पडती। इसी तरह डांट, फटकार,मार और झिड़कियों के बीच बचपन बीता मेरा। कालेज में आ गई थी मैं । उन्ही दिनों नीलू दी की शादी हो गई थी और शीलू दी के लिए जोर -शोर से लड़का ढूँढा जा रहा था . लेकिन कहीं भी बात तय नहीं हो पा रही थी . जो दो चार लडके शीलू दी को देखने आये थे, वे मुझे पसंद कर गये। इन बातों से शीलू दी मुझसे और अधिक चिढने लगीं थीं। चाची का सारा गुस्सा भी मुझ पर ही निकलता था। लेकिन अब मेर युवा होता मन विद्रोह करना चाहता था। लेकिन विद्रोह करके जाती कहां? पापा तो इतने तटस्थ हो गये थे कि मुझे महसूस ही नहीं होता था कि वे मेरे पापा हैं। हर महीने पैसे भेज कर ही उनहोंने अपने दायित्व की इतिश्री कर ली थी।
उन्हीं दिनों सुनील के यहां शीलू दी की शादी की बात चली थी। और हर बार की तरह इस बार भी जब सुनील पैवार सहित शीलू दी को देखने आये तो मुझे पसन्द कर चले गये। लेकिन इस बार सुनील पिछले लडकों की तरह चाचा के मना करने पर मान नहीं गये वरन ज़िद ही कर ली मुझे ब्याहने की। पापा को भी सुनील पसंद आये और फ़िर आनन-फ़ानन मेरा ब्याह हो गया। शायद पापा को भी जल्दी थी, मुझे उस घर से निकालने की।
बस इस तरह मैं सुनील की ज़िन्दगी में आ गई और तब से ही सुनील ने पलकों पर बिठाया है मुझे। हर दुख-दर्द को बराबरी के साथ महसूस किया है उन्होंने।
’अरे!! देवी जी अभी तक यहीं विराजमान हैं?’ बुरी तरह चौंक गई थी सुनील की आवाज़ पर।
’रीतू, हमारी शादी को दस साल हो गये लेकिन तुम्हारी ये चौंकने-सहम जाने की आदत अभी तक गई नहीं। तुम्हारे इस तरह सहम जाने से मुझे बहुत दुख होता है। तुम ये क्यों भूल जाती हो कि तुम अब उस कारागार में नहीं अपने घर में हो। जो कि पूरी तरह तुम पर आश्रित है। इस घर का प्रत्येक सदस्य तुम्हारा मुंह जोहता है, तुम किसी की मोहताज नहीं हो। तुम्हें इस तरह सिमटते देख कर लगता है, कि मेरे प्यार में ही कोई कमी है जो तुम अभी तक अपने भीतर समाये भय को बाहर नहीं निकाल पाईं।’
मैं तुम्हें कैसे समझाऊं सुनील कि जिसे शैशव से लेकर युवावस्था तक केवल मार-डांट ही मिली हो कडी से कडी सज़ा ही जिसके हिस्से में आई हो, उसके मन से भय इतनी आसानी से कैसे निकल सकता है? पहले सबकी डांट से सहमी रहती थी, अब तुम्हारे अत्यधिक प्यार से सहमी रहते हूं। प्लीज़ सुनील, मुझे इतना अधिक प्यार मत दो कि मैं उसे बर्दाश्त ही न कर पाऊं। मुझे सीमाबद्ध प्यार चाहिये, दे पाओगे सुनील?
मेरी आंखों से अविरल अश्रुधारा बह चली थी, जिसे सुनील कुछ समझे, कुछ नहीं।

19 टिप्‍पणियां:

  1. मुझे ऐसा लगा कि सिनेमा देख रहा हूँ क्योंकि ग्रामीण परिवेश में मुझे कई बार ऐसे दृश्य देखने पड़े हैं। सच से आँखें मिलाती आपकी यह रचना बहुत पसन्द आयी। मेरी शुभकामना यह प्यार बना रहे।

    सादर
    श्यामल सुमन
    09955373288
    www.manoramsuman.blogspot.com
    shyamalsuman@gmail.

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  2. वंदना जी आपकी तो अपनी एक स्टाईल है भावों से पूर्ण रचना पढने को मिलती है हर बार. जिसमे आपका वाक्य विन्यास इतना सहज होता है कि पढ़ते समय कहीं भी अजनबीपन नहीं लगता, बधाई

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  3. 1)श्यामल जी,रचना आप को अच्छी लगी,मेरी लेखनी सफ़ल हुई.

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  4. २)किशोर जी,आपने तो इतनी तारीफ़ कर दी, कि अब धन्यवाद के लिये भी शब्द नहीं हैं मेरे पास.

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  5. आधुनिक जीवन की विसंगति को आपने सीधे, सरल शब्दों में प्रभावशाली तरीके से अभिव्यक्ति दी है । कथ्य, शिल्प, भाव और विचार सभी प्रभावित करते हैं। सूक्ष्म संवेदना को आपने बडी बारीकी से रेखांकित किया है । बधाई ।-

    http://www.ashokvichar.blogspot.com

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  6. प्रियरंजन जी रचना को पढने और विश्लेषित करने के लिये आभारी हूं.

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  7. सरल भाषा में एक अनाथ एवं उपेक्षित बच्ची के मनोभावों का आपने बहुत ही सुंदर चित्रण किया है। बधाई एवं शुभकामनाएं।
    -श्याम सुन्दर अग्रवाल

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  8. kya kahun kai dino se blog par nahi tha..exam chal raha tha...aane ke baad aapka yah lekh padha kaaphi achchha laga.....likhane ka aapka alag andaaj kaaphi achchha lagta hai..

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  9. धन्यवाद मार्क जी.ब्लोग पर आपकी अनुपस्थिति बराबर महसूस हो रही थी.

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  10. कोमल बालमन पर लगे हुए आघात जीवन भर नहीं भूलते और व्यक्तित्व को प्रभावित करते हैं । इसीलिये बच्चों को कभी खेल में भी नहीं डराना चाहिये। सच्ची कहानी है । ऐसी मांयें दुर्लभ हैं जो दूसरे के बच्चॊं के साथ अपने बच्चे सा व्यवहार करें । यदि मायें अपने प्रेम को विस्तीर्ण करके दूसरेओं के बच्चों तक ला सकें तो परिवार न टूटें और समाज इससे बेहतर बन सके |

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  11. सच है अर्कजेश जी.लेकिन मैने तो अपने अब तक के जीवन में ऐसी इक्का-दुक्का मांएं ही देखीं हैं,जो दूसरे बच्चों को भी अपनत्व दे सकीं.

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  12. बैगर माँ की ममता के छाव के जीवन कड़ी धूप ही है ,इस कहानी से माँ की अहमियत समझ आती है ,सरल ,सुन्दर हृदय स्पर्शी न भूलने वाली ,

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  13. wandanaji, mere blog par aane ka shukriya, aap ke manas se roobroo hone ki utkantha me aapke blog tak panhuch gaya aur yanha aapke bachpan se muthbhed ho gai.dukh hua ki ateet ki kaalee parchhaiyon ne aapka peechha nahee chhodaa hai magar wartmaan me khush hain yah jankar mujhe bhi khushi hui, aap dil se likhti hain, koi banaawateepan nahee. aise jajbaat ki main kafee kadar karta hun.warnaa is jahaan me nakkal bhare pade hain jo koi asar paidaa nahee kar paate.likhtee rahiye.

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  14. आप ब्लौग पर आये, आभारी हूं. लेकिन एक बात स्पष्ट कर दूं कि ये या मेरी अन्य कहानियां मेरे व्यक्तिगत जीवन पर आधारित नहीं हैं.कहानीकार तो कहीं की भी और किसी की भी घटना पर कहानी रच देता है.मेरा बचपन तो ज़रूरत से ज़्यादा आरामतलबी और मां के अगाध स्नेह में गुज़रा है.

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  15. बहुत ही सुन्दर कहानी ...........इसके विषय बहुत ही वास्त्विकता के करीब लगी .................तथ्य बिल्कुल
    सटिक मनोविज्ञान को छूता है..................जो आदमी जिस चीज का आदि हो चुका हो गया रहता है वह चीज आसनी से नही निकलता है ...............बहुत ही खुब ..............बढिया

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