बुधवार, 29 मई 2013

सब तुम्हारे कारण हुआ पापा............

" How will you calculate the atomic mass of chlorine? "
"-------------------------------------------------------"
" नहीं  जानते ? "
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" A bus starting from rest moves with a uniform acceleration of 0.1ms-2 for 2 minutes , find the speed acquired , and the distance travelled.."
"-------------------------------------------------"
" जल्दी सॉल्व करो इसे."
................................................
" अरे! क्या हुआ? नहीं बनता? "
"..............................................."


" हद है! न कैमिस्ट्री न फिजिक्स ! कॉपी पर आड़ी टेढ़ी लाइनें खींचने से कुछ नहीं होगा . पढ़ाई में मन लगाओ वर्ना फेल हो जाओगे."
ज़रुरत से ज्यादा तेज़ आवाज़ हो गयी थी अविनाश की.
"पढ़ता तो रहता है बेचारा. तुम तो फालतू में ही चिल्लाने लगते हो."
बेटे के चेहरे की निरीहता बर्दाश्त नहीं हुई थी मालती से.
" पढता रहता है? अच्छा? तभी सारे विषयों में इतना अच्छा कर पा रहा है?  दो सड़े से सवाल पूछे, नहीं कर पाया. ये बात-बात पर पक्ष लेने के कारण भी सुधर नहीं पा रहे साहबजादे. जब मैं कुछ बोलूं, तो तुम चुप रहा करो.ढाल की तरह सामने मत आया करो. पढता तो रहता है, हुंह...."
कट कर रह गयी मालती. एक तो कभी पढ़ाते नहीं, उस पर अगर कहे-कहे पढ़ाने बैठ भी गए तो पता नहीं कहाँ -कहाँ के सवाल पूछने लगते हैं ! प्यार से पढ़ाना तो आता ही नहीं . वकील की तरह जिरह करने लगते हैं.
                        अविनाश भी कहाँ डांटना चाहता है? लेकिन पता नहीं कैसे डांटने लगता है? जबकि निरुत्तर बैठे गुड्डू की जगह हमेशा वो खुद को पाता है.
ठीक यही उम्र रही होगी  अविनाश की. नौवीं कक्षा में पढ़ता था, गुड्डू की ही तरह. पुराने ज़माने के कड़क पिताओं की तरह उसके पिता भी बहुत कड़क थे. हफ्ते में एकाध बार पढ़ाने ज़रूर बैठते थे, ख़ासतौर से रविवार को. संयुक्त परिवार था, सो सगे-चचेरे सब मिला के छह-सात भाई बहन पढ़ने बैठते. इतनी बड़ी क्लास के बच्चों की पढ़ाई पिता जी पहाड़े से शुरू करते.हद है! छटवीं से ले के ग्यारहवीं तक के बच्चे बैठे हैं, और पढ़ाई शुरू हो रही है पहाड़े से!! 
सबसे ज्यादा लानत-मलामत अविनाश की ही होती थी, क्योंकि उसे पहाड़े कभी याद नहीं होते थे. लिखते समय तो गिन-गिन के, गुणा करके लिख लिए, लेकिन पिताजी भी कम नहीं थे. जांचते समय वे १३, १८ और १९ का पहाड़ा ज़रूर सुनते थे. नहीं बनने पर कान खिंचाई. कान खिंचने की तक़लीफ़ से ज्यादा  तकलीफदेह उनकी बातें होतीं थीं. कान खींचना तो केवल भाई देखते थे, जबकि उनकी फटकार पूरे घर में सुनाई देती थी. वे डांटते कम थे, अपमानित ज्यादा करते थे.
औसत बुद्धि का था अविनाश. बहुत बढ़िया तो नहीं, पर ठीक-ठाक नंबरों से पास हो जाता था. फेल कभी नहीं हुआ.
ठीक उसी तरह गुड्डू है. औसत बुद्धि का है. परीक्षा के समय ही कायदे से पढ़ने बैठता है. बाकी पूरे साल पढने तो बैठता है, लेकिन पढता नहीं है. बस होमवर्क किया, और हो गयी पढ़ाई. जुट के पढ़ते देखा ही  नहीं कभी उसे. मन ही नहीं लगता उसका . उसके यार-दोस्त भी उसी के  जैसे मिल गए हैं.  शाम चार बजे से ही क्रिकेट का बल्ला लिए गेट के आस-पास घूमने लगते हैं. 
अविनाश के पिताजी हमेशा उसकी तुलना दूसरे लड़कों से करके उसे नीचा दिखाते रहते थे. शायद इसीलिये अविनाश ने कभी  गुड्डू की तुलना  दूसरे लड़कों से नहीं की. इस अपमान के दंश को खूब जानता है अविनाश. न. गलती से भी तुलना नहीं करता. बुरा तो उसे मालती का टोकना भी नहीं लगता. बल्कि चाहता है कि अगर वो गुड्डू पर बरसे, तो मालती खड़ी दिखाई दे गुड्डू के पक्ष में. ऐसा न हो कि उसकी माँ की तरह मालती भी सहम के पीछे खड़ी रहे.... जब पिताजी अविनाश पर गालियों की बौछार कर रहे होते थे,  तब अविनाश ने कितना चाहा कि उसकी माँ, उसका पक्ष ले, उसे बचा ले, लेकिन अविनाश के हिटलरी पिता का आतंक तो सब पर था। माँ चाह कर भी उसका पक्ष नहीं ले पाती थी। चाहती ज़रूर होगी , ऐसा अविनाश को  लगता है।
                                                       " सुनो, आज गुड्डू का रिज़ल्ट मिलेगा, तुम जाओगे लेने या मैं जाऊं? "
" तुम ही चली जाना मुझे शायद टाइम न मिले।"
राहत की सांस ली मालती ने। चाहती तो यही थी मालती कि रिज़ल्ट लेने अविनाश न जाएँ। क्या पता कम नंबर देख के वहीं भड़क गए लडके से डांट-डपट करने लगे? कोई  ठिकाना है क्या? लेकिन अब अविनाश को आड़े हाथों लेने का मौक़ा क्यों गँवाए ?
" तुम और तुम्हारा काम! दुनिया में जैसे और कोई  काम ही नहीं करता! सब नौकरी भी करते हैं और बच्चों का भी पूरा ध्यान रखते हैं। देखना, आधे से ज़्यादा जेंट्स ही आयेंगे वहां।"
लो! मन की भी हो गयी और चार बातें भी सूना दीं  :)
" ठीक है-ठीक है भाई मैं ही चला जाउंगा तुम रहने दो।"
अयं! ये क्या हो गया?
" न . रहने दो। जैसे अभी तक जाती रही हूँ, वैसे ही आज भी चली जाउंगी। तुम करो अपनी नौकरी।"
हँसी आ गयी अविनाश को।जानता है, मालती के मन में क्या चल रहा है। उसे जाने भी नहीं देना चाहती, और आरोप भी लगा रही है। मालती के झूठे   क्रोध को उससे बेहतर कौन जानेगा भला?
 इस बार B ग्रेड मिला था गुड्डू को। चलो ठीक ही है। 
" पापा , किताबें आज ही दिलवा दीजियेगा वरना  मिलेंगीं नहीं।" 
अपने ग्रेड से गुड्डू अतिरिक्त उत्साहित था। लग रहा था, जैसे बस अभी ही पढ़ाई शुरू कर देगा। 
शाम को अविनाश किताबें ले भी आये।
" पापा केवल टैक्स्ट बुक्स से कुछ नहीं होगा 40% बाहर से आता है। सभी सबजेक्ट्स की रिफरेन्स बुक्स, गाइड, और आर.के. शर्मा वाली मैथ्स की बुक भी चाहिए"
" ठीक है ले आऊंगा अभी इन्हें पढना शुरू करो।"
अगले दिन  अविनाश बुक-स्टॉल पर गया सारी किताबें देखीं इतनी सारी अतिरिक्त किताबें?? एक-एक यूनिट के सौ-डेढ़ सौ अतिरिक्त प्रश्न!! कैसे पढ़ पायेगा गुड्डू? अविनाश उसकी बौद्धिक क्षमता जानता है। लेकिन बच्चे को ये कहा भी तो नहीं जा सकता कि वो इतना सब नहीं पढ़ पायेगा .... देखूंगा बाद में. कुछ किताबें खरीद ली थीं, लेकिन अधिकांश छोड़ दी थीं अविनाश ने. गुड्डू से कह दिया कि एकाध महीने बाद सभी रिफ़ेरेंस बुक्स ला देगा.
गुड्डू को भी जैसे मुक्ति मिली. पहले ही इतनी किताबें देख-देख के हालत खराब हो रही थी.
शुरु में कुछ तेज़, और बाद में अपने ढर्रे पर चलने लगी उसकी पढाई. हां, बीच-बीच में पूरी गम्भीरता के साथ  अविनाश को याद दिला देता कि किताबें लानी हैं. अविनाश भी उसी गम्भीरता से किताबें लाने का वादा कर देता. 
अब जब परीक्षाओं को केवल दो महीने रह गये तो गुड्डू ने भी जल्दी-जल्दी याद दिलाना शुरु कर दिया, वो भी इस उलाहने के साथ, कि पूरा साल निकाल दिया पापा आपने!  कम से कम अभी ही रिफ़रेंस बुक ला दो. अब वैसे लाने से भी क्या फ़ायदा? कुछ याद तो करने से रहा. कब से कह रहा हूं आपसे फिर नम्बर कम आयेंगे तो आप ही गुस्सा करेंगे. 
आज भी गुड्डू  पापा को किताब लाने की याद दिलाता स्कूल चला गया . अविनाश ने उधर गुड्डू से हां कहा, इधर मालती ने उसे आड़े हाथों लिया-
" क्या बात है, बच्चे की किताबें ला के क्यों नहीं देते? खुद ही कहते हो, पढता नहीं है और जब बच्चा बार-बार याद दिला रहा है तो कुछ याद ही नहीं रखते."
" अरे मालती, जितनी किताबें ला के दी हैं, उतनी तो पढ डाले पहले. देखा नहीं, कुछ किताबें तो खुली तक नहीं. खैर, ले आउंगा आज ही."
"अब क्या ले आउंगा आज ही....कुल जमा एक महीना बचा है परीक्षा को. अब अपने कोचिंग के नोट्स तैयार करे, कि तुम्हारी किताब? लानी थी तो चार महीना पहले लाते..अब तो लाओ, न लाओ बराबर."
चुप लगा गया अविनाश. उसी दिन फिजिक्स की नयी रिफ़रेंस बुक ला के भी दे दी. 
गुड्डू ने भी भड़ास निकाली. 
"बहुत लेट कर दिये पापा आप. उधर कोचिंग में तो ये वाली पूरी बुक कब की करवा दी गयी. मैं  सॉल्व नहीं कर पाया क्योंकि मेरे पास बुक ही नहीं थी. अब देखिये कितना कर पाता हूं इस बुक से. भगवान भरोसे है रिज़ल्ट तो. क्योंकि सर कह रहे थे कि अधिकतर इसी बुक से आता है पेपर में "
अजब रोनी सूरत बना ली थी गुड्डू ने. लेकिन मन ही मन लाख-लाख धन्यवाद दे रहा था पापा को कि भला हुआ जो आप ये किताब इतनी देर से लाये, वरना इसका तो एक भी डेरिवेशन मेरी समझ में न आता.......... 
उधर अविनाश मन ही मन मुस्कुराये जा रहा था. उसकी मुस्कुराहट थम ही नहीं रही थी... खुद को तैयार कर रहा था रिज़ल्ट के बाद इस दोषारोपण के लिये कि केवल तुम्हारे कारण कम नम्बर आये पापा.....

शनिवार, 2 मार्च 2013

मेरी पसन्द........


इक बार कहो तुम मेरी हो........
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हम घूम चुके बस्ती-वन में
इक आस का फाँस लिए मन में

कोई साजन हो, कोई प्यारा हो
कोई दीपक हो, कोई तारा हो

जब जीवन-रात अंधेरी हो
इक बार कहो तुम मेरी हो

जब सावन-बादल छाए हों
जब फागुन फूल खिलाए हों

जब चंदा रूप लुटाता हो
जब सूरज धूप नहाता हो

या शाम ने बस्ती घेरी हो
इक बार कहो तुम मेरी हो

हाँ दिल का दामन फैला है
क्यों गोरी का दिल मैला है

हम कब तक पीत के धोखे में
तुम कब तक दूर झरोखे में

कब दीद से दिल की सेरी हो
इक बार कहो तुम मेरी हो

क्या झगड़ा सूद-ख़सारे का
ये काज नहीं बंजारे का

सब सोना रूपा ले जाए
सब दुनिया, दुनिया ले जाए

तुम एक मुझे बहुतेरी हो
इक बार कहो तुम मेरी हो

0- इब्ने इंशा

सोमवार, 2 जुलाई 2012

कोई तो शर्मिंदा हो....


कोई मुम्बई जाये और हाज़ी अली की दरगाह पर ना जाये ऐसा हो सकता है क्या? हम भी पूरे भक्ति भाव से दरगाह पर गये।समंदर के बीच स्थित यह दरगाह सिद्ध दरगाहों में से एक मानी जाती है। समुन्दर के पानी को काट कर बनाया गया यह पवित्र स्थल लोगों ने इतना अपवित्र कर रखा है, कि दरगाह के प्रवेश द्वार से ही हर व्यक्ति को नाक बंद करनी पडती है। कचरा देख कर अफ़सोस होता है। प्रतिदिन जिस स्थान पर हज़ारों दर्शनार्थी मन्नत मांगने दूर-दूर से आते हों,उस स्थान की सफ़ाई व्यवस्था पर ध्यान देना ज़रूरी नहीं है क्या? यह तस्वीर तो मुझे मजबूरन उतारनी पडी, कम से कम कुछ लोग तो शर्मिन्दा हो सकें ,अपने द्वारा फैलाई गई इस गन्दगी को देखकर....

मंगलवार, 14 फ़रवरी 2012

श्रद्धान्जलि......


सुप्रसिद्ध शायर/शिक्षाविद शहरयार साहब अब हमारे बीच नहीं हैं. लम्बी बीमारी के बाद कल रात उनका निधन हो गया. वे ७६ वर्ष के थे. यह रचना श्रद्धान्जलि-स्वरूप.

शहरयार : एक परिचय

16 जून 1936-13 फरवरी, 2012

वास्तविक नाम : डॉ. अखलाक मोहम्मद खान

उपनाम : शहरयार

जन्म स्थान : आंवला, बरेली, उत्तरप्रदेश।

प्रमुख कृतियां : इस्म-ए-आज़म (1965), ख़्वाब का दर बंद है (1987), मिलता रहूंगा ख़्वाब में।

अख़लाक़ मोहम्मद ख़ानविविध : 'उमराव जान', 'गमन' और 'अंजुमन' जैसी फिल्मों के गीतकार । साहित्य अकादमी पुरस्कार (1987), ज्ञानपीठ पुरस्कार (20
08)। अलीगढ़ विश्वविद्यालय में उर्दू के प्रोफे
सर और उर्दू विभाग के अध्यक्ष रहे।
ज़िंदगी जैसी तवक़्क़ो थी नहीं, कुछ कम है
हर घड़ी होता है अहसास, कहीं कुछ कम है

घर की तामीर तसव्वुर ही में हो सकती है
अपने नक़्शे के मुताबिक़ यह ज़मीं कुछ कम है

बिछड़े लोगों से मुलाक़ात कभी फिर होगी
दिल में उम्मीद तो काफ़ी है, यकीं कुछ कम है

अब जिधर देखिये लगता है कि इस दुनिया में
कहीं कुछ चीज़ ज़ियादा है कहीं कुछ कम है

आज भी है तेरी दूरी ही उदासी का सबब
यह अलग बात कि पहली सी नहीं कुछ कम है



सोमवार, 6 फ़रवरी 2012

संत रविदास

मध्ययुगीन साधकों में संत रैदास का विशिष्ट स्थान है। निम्नवर्ग में समुत्पन्न होकर भी उत्तम जीवन शैली, उत्कृष्ट साधना-पद्धति और उल्लेखनीय आचरण के कारण वे आज भी भारतीय धर्म-साधना के इतिहास में आदर के साथ याद किए जाते हैं।

संत रैदास भी कबीर-परंपरा के संत हैं। संत रैदास या रविदास के जीवनकाल की तिथि के विषय में कुछ निश्चित रूप से जानकारी नहीं है। इसके समकालीन धन्ना और मीरा ने अपनी रचनाओं में बहुत श्रद्धा से इनका उल्लेख किया है। ऐसा माना जाता है कि ये संत कबीरदास के समकालीन थे। ‘रैदास कीपरिचई’ में उनके जन्मकाल का उल्लेख नहीं है। फिर भी यह कहा जा सकता है कि इनका जन्म पंद्रहवीं शताब्दी में संत कबीर की जन्मभूमि लहरतारा से दक्षिण मडुवाडीह, बनारस में हुआ था। ( संत रविदास का यह परिचय जी की पोस्ट- संत रैदास से साभार.)

प्रभु जी तुम चंदन हम पानी।
जाकी अंग-अंग बास समानी॥

प्रभु जी तुम घन बन हम मोरा।
जैसे चितवत चंद चकोरा॥

प्रभु जी तुम दीपक हम बाती।
जाकी जोति बरै दिन राती॥

प्रभु जी तुम मोती हम धागा।
जैसे सोनहिं मिलत सोहागा।

प्रभु जी तुम स्वामी हम दासा।
ऐसी भक्ति करै 'रैदासा॥

रविवार, 6 नवंबर 2011

विरुद्ध.....

(अपने दूसरे ब्लॉग " अपनी बात..." पर मैने श्री हरिशंकर परसाई जी से जुड़ा अपना संस्मरण पोस्ट किया तो उसमें वसुधा में प्रकाशित कहानी का भी ज़िक्र आया. मेरे कई मित्रों ने उस कहानी को पोस्ट करने का आग्रह किया. तो लीजिये, आप सबकी फ़रमाइश पर ..... १९८७ में लिखी और वसुधा में परसाई जी द्वारा प्रकाशित कहानी)

बहुत
दिनों के बाद आज पापा के ठहाके सुनाई दे रहे थे. दिन भर की थकान के बावजूद भाभी फिर किचन में व्यस्त दिखाई दे रही थीं.सबके चेहरों पर छाई खुशी, बस देखने लायक़ थी. और सच कहूं तो मेरा मन भी आज बेहद हल्का हो आया था.
पिछले कुछ वर्षों से पापा मेरे विवाह को लेकर इतने चिंतित और परेशान थे कि उनकी हालत देखते हुए मुझे भी लगता था कि कैसे भी , कहीं भी मेरा रिश्ता तय हो जाये, अन्यथा शादी की मेरी इच्छा तो उसी दिन मर गई थी ,जिस दिन पापा ने मुझे मांगने आये सुनील की झोली को मेरे बदले ढेर सारी लताड़ और अपमानजनक शब्दों से भरदिया था. मैं भी पीछे हट गई थी . परिपक्व अवस्था होने के कारण डर गई थी शायद पापा कोभी तरह भटकना, परेशान होना, वैवाहिक कॉलम देखना मंजूर था, लेकिन सुनील के साथ रिश्ता मंजूर नहींथा. इसके पीछेसुनील का विजातीय होना ही मुख्य कारण रहा हो शायद.

भी दस दिन पहले ही तो ताऊ जी का पत्र आया था कि शर्मा जी को उन्होंने मेरी तस्वीर और मुझसे सम्बन्धित सारी जानकारियां दे दी हैं. और वे लोग ग्यारह तारीख को मुझे देखने रहे हैं

हमेशा की तरह घर को फिर नये सिरे से व्यवस्थित किया गया.सोफ़ों पर नये कवर, कुशन, बेड शीट्स सब बदलदिये गये. नयी क्रॉकरी और स्टील के नये बर्तन, जिन्हें देख के कोई भी कह सकता था कि इनका इस्तेमाल अभी तक नहीं हुआ है, निकाले गये. घर के सभी लोग उत्साहित थे, एक मुझे छोड़ के. मैं पूरी तरह तैयार थी ये सुनने के लिये कि- " हम घर पहुंच कर पत्र लिखेंगे". पत्र का मजमून भी मुझे मालूम था. हमेशा ऐसा ही होता है. तब, जबकि मैं सुन्दर ही कही जाती हूं. शकल-सूरत ठीक-ठाक ही दी है भगवान ने.और फिर हमारे मम्मी-पापा ने क्या नहींसिखाया हम भाई-बहनों को?
संगीत में मेरी रुचि और गले को देखते हुए पापा ने बी.म्यूज़. की डिग्री दिलाई थी मुझे. एम.एससी. तो थी ही. सुरसधा रहे, इसके रियाज़ के लिये तानपूरा भी इलाहाबाद से मंगवा के दिया था उन्होंने.
नियत समय पर शर्मा जी आये और मेरी आशा के विपरीत , सगाई की औपचारिकता भी पूरी कर गये थे. बस, तभी से खुशी तो जैसे हमारे घर से छलकी-छलकी पड़ रही थी.

बहुत धूम-धाम से शादी की थी पापा ने. मैं भी ऐसा सुदर्शन पति पाकर एकबारगी सुनील को भुला बैठी थी.
सब कुछ ठीक होने के बाद भी बेहद बंधी-बंधी सी महसूस करती थी मैं. पता नहीं सबके व्यवहार में ऐसा क्या था,कि बड़ी सहमी-सहमी सी रहती थी. हर वक्त राहुल की पद-प्रतिष्ठा के मुताबिक रहना पड़ता था मुझे. इतनी बंध के तो कभी रही ही नहीं मैं.जब जो चाहा सो किया. सचमुच कभी-कभी तो लगता कि जबरन ओढी गई इस सभ्यता को उतार फेंकूं, और खूब ज़ोर से हंसू, खिलखिलाऊं. लेकिन . यहां तो सब मुस्कुराते हैं वो भी कड़वा सा.
एक साल होने को आया, लेकिन अभी तक राहुल की मित्र-मंडली एक-एक कर हमें कभी डिनर तो कभी लंच परआमंत्रित कर रही थी. इसी क्रम में आज हमें राहुल के जनरल मैनेजर कोहली साहब ने डिनर पर आमंत्रित कियाथा. बड़े जतन से तैयार हुई थी मैं. लाल सिल्क की साड़ी पहन कर तो मैं अपने आप पर ही मुग्ध हो उठी थी, सच्ची.
हमारे स्वागत में कोहली जी ने तो एक छोटी-मोटी पार्टी का ही इन्तज़ाम कर डाला था
राहुल के परिचितों के बीच बड़े भैया के सहपाठी, जो कि संगीत में भी बड़ी गहरी दखल रखते थे, को देख कर मुझे तो लगा कि मैं शशि दा को नहीं, बल्कि बड़े भैया को ही देख रही हूं। सच! खुशी के मारे मेरे तो आंसू ही गए. शशि दा हमेशा से ही मेरे गायन के प्रशंसक रहे हैंबस यहाँ भी उन्होंने अपनी पुरानी रागमाला शुरू कर दी और उपस्थित लोगों को मेरे बारे में विस्तार से जानकारियां देने लगे, बल्कि अतिश्योक्तिपूर्ण गुणगान करने लगे
" दोस्तों, आज हमारे बीच अंजलि जी मौजूद हैं, तो मैं उनसे आग्रह करूंगा कि वे एक गीत सुना कर हम सब को कृतार्थ करें, यदि राहुल साब को कोई आपत्ति हो, तो।"
" लो! भला राहुल को क्या आपत्ति होगी? शुरू हो जाइए भाभी जी।"
" अब तो राहुल को आपत्ति हो भी , तब भी हम आपका गाना सुनेंगे ही। "
चारों तरफ से पड़ते दवाब और इतने दिनों बाद फिर गाने की बात सुन के मेरा मन भी कुछ गाने को होने लगा था।ग़ालिब की एक सुन्दर सी ग़ज़ल सुनाई थी मैंनेहॉल तालियों कि गड़गड़ाहट से गूँज उठा थामैंने भी गर्वीली दृष्टि राहुल पर डाली, लेकिन राहुल कहीं और देख रहे थे.हाँ, उनके चहरे पर इतनी कठोरता छाई थी, कि मैं उनकी नाराजगी स्पष्ट अनुभव कर रही थीमूड ऑफ हो गया था मेराराहुल उठ के कोहली जी से विदा लेने लगे थेमुझे विदा करते लोग , एक बार फिर मुझे घेर के बधाई देने लगे थे, तभी राहुल आये थे और मेरा हाथ पकड़ कर लगभग खींचते हुए, सबको शुभरात्रि कह बाहर चल दिए थेराहुल की इस हरकत पर मुझे बड़ा आश्चर्य और अपमान भी महसूस हुआ थाकार में राहुल के पार्श्व में बैठ कर भी मुझे लगा था , कि मैं राहुल से दूर हूँ, बहुत दूर.
घर पहुंचते ही राहुल फट पड़े थे-
" क्या ज़रुरत थी तुम्हें वहां गाने की? क्या को भी बहाना नहीं था तुम्हारे पास? उस शशि दा ने ज़रा से तुम्हारे गले की तारीफ़ क्या की, तुम तो शुरू ही हो गईं? कान खोल के सुन लो, मुझे कोठेवालियों की तरह गाने वाली लड़कियां बिलकुल पसंद नहीं
क्या! कोठेवालियों की तरह!!
मैं अवाक थी. तो क्या मेरे पापा किसी कोठे के संचालक थे, जिन्होंने मुझे विधिवत संगीत की शिक्षा दिलवाई!! जैसे-तैसे अपने आप को संयत कर पूछा था मैंने-
" इस तरह गाना तुम्हारी नज़र में कोठेवालियों की तरह गाना है?"
" जी हां. महफ़िलों में गाना मैं निकृष्टम मानता हूं. एक बात और, यदि मेरे साथ रहना है तो आपको मेरी तरह रहना होगा. और तुम्हारा वो शशि दा, उसे भी मैं अच्छी तरह जानता हूं. एक नम्बर का लफ़ंगा है. तुम्हारी तारीफ़ करके इतना गदगद क्यों हो रहा था? और जिस तरह वो तुम्हें देखे जा रहा था, क्या इस तरह कोई भी शरीफ़ आदमी किसी की पत्नी को घूरता है? क्यों कर रहा था ऐसा वो? कब से पहचान है तुम लोगों की?"
ज़मीन पर गिरी थी मैं ! इतने भव्य व्यक्तित्व के पीछे इतना बौना - ओछा इंसान!! कितनी कुत्सित सोच!!!
पूरी रात राहुल के शब्दों ने सोने नहीं दिया था. मुझे और शशि दा को लेकर राहुल कितनी बड़ी बात कह गये हैं. मैं शशि दा को बचपन से जानती हूं. ये सही है कि वे किसी की भी प्रशंसा इतने खुले दिल से करते हैं कि कोई शक्की दिमाग़ आदमी ज़रूर उसे ग़लत अर्थों में ले ले, जैसा राहुल के साथ हुआ. लेकिन क्या इतने दिनों के साथ के बाद भी राहुल मुझे नहीं समझ पाये? पति-पत्नी का सम्बंध विश्वास पर ही टिका होता है.
और जिस दिन ये विश्वास टूटता है, उसी दिन दाम्पत्य जीवन से प्रेम खत्म हो जाता है. बाक़ी की पूरी विवाहित ज़िन्दगी एक सामाजिक समझौते के तहत गुज़रती रहती है.
इस घटना के बाद से तो जैसे राहुल मुखर हो उठे थे. बात-बात पर व्यंग्य करना, शक करना. यहां तक कि यदि मैं खिड़की में खड़ी हूं, तो फ़ौरन आकर नीचे देखते कि मैं किसे देख रही हूं. बल्कि मुझसे कह ही देते थे. तिलमिला के रह जाती थी मैं. अभी तक मेरे चरित्र पर किसी ने आक्षेप नहीं किया था, और अब मेरा पति ही मुझ पर शक कर रहा है!! कैसे गुज़ारूंगी इतनी लम्बी ज़िन्दगी? ये कैसा कारावास मिला था मुझे? बिना किसी अपराध के आजीवन सज़ा??
घर में शान्ति रहे, हमारे सम्बंध सामान्य बने रहें, सिर्फ़ इसीलिये मैने मम्मी-पापा के दिए हुए अपने तानपूरे को उसी दिन से छुआ तक नहीं था, जिस दिन राहुल ने संगीत के प्रति ऐसी वितृष्णा ज़ाहिर की थी. वरना उसकी धूल तो रोज़ झाड़ ही देती थी. मैने अपना संगीत छोड़ा तुम्हारे लिये राहुल, सिर्फ़ तुम्हारे लिये और तुम मेरी हर छोटी-बड़ी हरक़त पर नज़र रखते हो? उफ़!! कितना असहनीय, मन को दुखाने वाला होता है ये साथ. पता नहीं कैसे शादी के बाद इतने दिनों तक राहुल अपने इस शक़्क़ी मिज़ाज़ को कैसे जब्त किये रहे.
आज तो हद ही हो गई. सुबह सुबह शशि दादा एक पत्रिका का नया अंक लेकर आ धमके, और फिर उसमें प्रकाशित सुगम संगीत की एक प्रतियोगिता के नियमों के बारे में विस्तार से समझाने लगे. अपनी आदत के मुताबिक वे मेरी प्रशंसा के पुल भी बांधते जा रहे थे तभी बेडरूम से राहुल अपने स्लीपिंग गाउन की बेल्ट कसते हुए बाहर आकर बड़ी तल्खी से बोले थे-
" शशि दा इस संगीत सम्बंधी जानकारी की मेरी पत्नी को तो आवश्यकता नहीं होनी चाहिए. हां यदि अंजलि जी पर गायकी का नशा चढा हुआ हो, तो ज़रूर आप इन्हें किसी संगीतमय स्थान पर ले जाकर बिठा दें, ताकि ये अपने सुर-ताल का पूरा और सही उपयोग कर सकें."
शशि दा अवाक राहुल को देख रहे थे, जैसे उसके कहे शब्दों का अर्थ ढूंढ रहे हों. शर्म और अपमान से मेरा चेहरा लाल हो गया था. शशि दा भी राहुल के कटाक्ष को तो नहीं समझे, लेकिन वक्त की नज़ाकत को ज़रूर समझ गये और अपनी पत्रिका समेट चुपचाप चले गये. कितना तक़लीफ़देह! मुझे लगा कि मैं इस मानसिक रूप से बीमार आदमी के साथ कैसे और क्यों रह रही हूं? इसकी अंगुली के हर सही-ग़लत इशारे पर क्यों नाचती हूं? क्यों इसके किसी भी ग़लत आरोप का खंडन नहीं करती? ये फ़िल्म नहीं चल रही है कि तीन घंटे बाद सारी ग़लतफ़हमियां दूर हो जायेंगीं. यहां तो पूरी उम्र गुज़र जायेगी और शायद तब भी ग़लतफ़हमियां दूर न हो सकें.
मैं अभी भी विश्वास नहीं कर पा रही थी कि शशि दा के सामने राहुल ने इतना कुछ कहा है. शायद यही जांचने के लिये मैंने पूछा था-
" राहुल, क्या तुम जनते हो कि तुमने शशि दा के सामने क्या कहा है?"
" क्यों? क्या मैं तुम्हें नशे में दिखाई दे रहा हूं? एक बार फिर और शायद अन्तिम बार कह रहा हूं कि मुझे तुम्हारा ये गाना और उसके बहाने इस शशि का आना सख्त नापसंद है. यदि तुमसे ये संगीत न छोड़ा जा रहा हो तो तुम मेरी ओर से स्वतंत्र हो. मैं पहले भी कह चुका हूं कि यदि तुम्हें मेरे साथ रहना है तो मेरी तरह रहना होगा, वरना हमारे रास्ते अलग हैं ."
मेरा जवाब सुने बिना ही राहुल दरवाज़े से बाहर हो गये थे, उसकी उन्हें ज़रूरत भी कहां थी?
मैं जानती हूं राहुल कि तुम्हें क्या पसंद है. तुम्हें फ़्लोर पर डांस करती, अपने पतियों के अधिकारियों से मुस्कुरा मुस्कुरा के बात करती लड़कियां अच्छी लगती हैं. मुझे याद है शादी के बाद वाली तुम्हारे बॉस की पार्टी में मैने उनका डांस का ऑफ़र ठुकरा दिया था, जो तुम्हें नाग़वार गुज़रा था. लेकिन मुझे इस तरह की लड़कियां अच्छी नहीं लगतीं.
हो सकता है कि उन लड़कियों के सामने किसी तरह की मजबूरी रहती हो, या फिर वे ही अंधी आधुनिकता की दौड़ में शामिल होने के लिये ये सब करती हों, लेकिन मेरे सामने कोई मजबूरी नही है. और न ही मैं तुम्हारे साथ रहने को मजबूर हूं राहुल. आज भी मैं अपनी मर्ज़ी से अपना रास्ता चुन सकती हूं. मुझे निर्णय ले ही लेना चाहिये.
और आज लगभग साल भर बाद एक बार फिर घर में तानपूरे के स्वर गूंज रहे थे.